हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में देव आस्था से जुड़ी एक अनोखी पहल चर्चा में है, यहां देव आदेश के बाद गांव में नशे पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया है, बीड़ी-सिगरेट और गुटखा लाने पर भी पाबंदी की बात सामने आई है।
हिमखबर डेस्क
देवभूमि कुल्लू में देवी-देवताओं की परंपराएं आज भी लोगों की जीवनशैली का हिस्सा हैं। यहां एक ऐसा गांव भी है, जहां बीड़ी-सिगरेट पीना तो दूर, इन्हें गांव की सीमा के भीतर लाने तक की मनाही है। तंबाकू, खैनी और गुटखा जैसे पदार्थों से दूरी बनाने की यह परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है।
देवता शिवराड़ी नारायण के आदेश के आगे गांव का कोई व्यक्ति उल्लंघन करने की हिम्मत नहीं करता। यही वजह है कि फलाण गांव में लोग नशे से दूर रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में पहुंचे देवता शिवराड़ी नारायण की परंपराओं की चर्चा भी लोगों के बीच आकर्षण का विषय बनी हुई है।
सदियों ने निभा रहे परंपरा
गूर राकेश कुमार ने बताया कि देवता की मान्यता के अनुसार प्राचीन समय में सीघी और धिंगी दैत्यों के साथ युद्ध के दौरान देवता शिवराड़ी नारायण की सेना पर संकट आ गया था। दैत्यों से बचने के लिए देवता तंबाकू के फूल में मधुमक्खी का रूप धारण कर छिप गए। देवता ने तंबाकू के फूल से अपना ठिकाना गुप्त रखने का आग्रह किया, लेकिन दैत्यों के पहुंचने पर फूल की डाली झुक गई और उन्हें देवता के छिपे होने का पता चल गया। इसके बाद देवता ने आदेश दिया कि गांव में तंबाकू का सेवन नहीं होगा। तभी से ग्रामीण इस परंपरा का पालन कर रहे हैं।
बाहरी व्यक्ति को गांव से बाहर रखने पड़ते हैं नशीले पदार्थ
देवता के गूर के अनुसार, गांव में प्रवेश करने वाले बाहरी लोगों को भी बीड़ी-सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद गांव की सीमा से बाहर रखने पड़ते हैं। देवता के प्रकोप की मान्यता के कारण आज तक कोई भी ग्रामीण इस परंपरा को तोड़ने का प्रयास नहीं करता। देवता को संतान की कामना लेकर आने वाली महिलाओं की मनोकामनाएं पूरी करने वाला भी माना जाता है।
फलाणी, त्रिजुगी और पंचाली नारायण के यहां भी मनाही
फलाण गांव में देवता शिवराड़ी नारायण के अलावा फलाणी नारायण, त्रिजुगी नारायण और पंचाली नारायण की परंपराओं में भी बीड़ी-सिगरेट लाना निषेध माना जाता है। ग्रामीण इन देव आदेशों का पालन करते हुए गांव को तंबाकू और नशे के पदार्थों से दूर रखने की परंपरा निभा रहे हैं।

