हिमाचल प्रदेश की धरती से निकलकर बॉलीवुड में अपनी अलग पहचान बनाने वाले मोहित चौहान अपनी सुरीली और भावपूर्ण आवाज के लिए मशहूर हैं, उनके गीतों में जहां मोहब्बत की मिठास है, वहीं भावनाओं और बगावत की झलक भी सुनाई देती है।
सिरमौर – नरेश कुमार राधे
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले के नाहन से निकलकर देश-दुनिया में अपनी आवाज का जादू बिखेरने वाले मोहित चौहान आज संगीत की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। कभी मोहब्बत का एहसास जगाने वाले गीतों से तो कभी जुनून और बगावत के सुरों से उन्होंने श्रोताओं के दिलों में खास जगह बनाई है।
तुम से ही, मसकली, साड्डा हक और नादान परिंदे जैसे गीतों में अपनी आवाज देने वाले मोहित चौहान का सफर इस बात की मिसाल है कि प्रतिभा, लगन और अपने सपनों के प्रति समर्पण से एक अलग पहचान बनाई जा सकती है।
नाहन की गलियों से शुरू हुआ संगीत का सफर
मोहित चौहान का जन्म 11 मार्च 1966 को नाहन में हुआ। हिमाचल की वादियों में बीता उनका बचपन और संगीत के प्रति शुरुआती लगाव उनके सफर का अहम हिस्सा रहे। उनके पिता बी.के. राणा और माता कृष्णा राणा थीं। उनकी माता का निधन हो चुका है। परिवार में उनका एक भाई और एक बहन भी हैं। 29 जून 2012 को उन्होंने प्रार्थना गहलोत से विवाह किया, जो पत्रकारिता से जुड़ी रही हैं।
मोहित चौहान का संगीत से जुड़ाव बचपन से ही रहा। उनके दादा शास्त्रीय संगीत में रुचि रखते थे और हारमोनियम बजाते थे। संगीत से जुड़े इसी पारिवारिक माहौल ने उनके भीतर सुरों के प्रति लगाव को और गहरा किया। नाहन के विला राउंड में गिटार के साथ गुनगुनाने वाले मोहित के लिए संगीत महज शौक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जीवन का उद्देश्य बन गया।
पढ़ाई पूरी की, लेकिन दिल में संगीत के सपने
मोहित चौहान ने धर्मशाला से एमएससी की पढ़ाई पूरी की। परिवार चाहता था कि वह अपने बड़े भाई की तरह जीवन में स्थिरता हासिल करें, लेकिन उनकी रुचि संगीत की दुनिया में आगे बढ़ने की थी। उन्होंने अपने इस जुनून को बनाए रखा और संगीत के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने की दिशा में प्रयास जारी रखे।
संगीत की दुनिया में पहचान बनाना आसान नहीं था। इसके लिए लगातार मेहनत, धैर्य और अपने हुनर पर भरोसा बनाए रखना जरूरी था। मोहित चौहान ने भी इस सफर में संघर्ष किया। उनके करियर में सिल्क रूट बैंड एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ, जिसके गीत डूबा-डूबा ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। इस गीत की लोकप्रियता ने उनकी आवाज को बड़ी संख्या में श्रोताओं तक पहुंचाया और संगीत की दुनिया में उनके लिए नए अवसरों के रास्ते खोले।
कभी मोहब्बत, कभी बगावत के सुर
मोहित चौहान की आवाज की खासियत है कि वह अलग-अलग भावनाओं को सहजता से श्रोताओं तक पहुंचाती है। फिल्म रंग दे बसंती का गीत खून चला, जब वी मेट का तुम से ही, दिल्ली-6 का मसकली और रॉकस्टार के साड्डा हक, नादान परिंदे तथा कुन फाया कुन जैसे गीतों ने उनकी गायकी के अलग-अलग रंगों को सामने रखा।
रोमांस से लेकर दर्द, जुनून और आत्ममंथन तक, उनके गीतों में भावनाओं की विविधता सुनने को मिलती है। यही वजह है कि उनके गाए कई गीत समय के साथ भी श्रोताओं के बीच लोकप्रिय बने हुए हैं। उनकी आवाज ने उन्हें बॉलीवुड के पार्श्व गायकों में एक विशिष्ट पहचान दिलाई।
हिमाचल की मिट्टी और लोकसंगीत से जुड़ाव
बॉलीवुड में पहचान बनाने के बावजूद मोहित चौहान का हिमाचल प्रदेश से जुड़ाव उनके सफर का महत्वपूर्ण पहलू है। पहाड़ों की संस्कृति और लोकसंगीत के प्रति उनका लगाव उनके काम में भी नजर आता है। माई नी मेरिए जैसे हिमाचली लोकगीत को व्यापक श्रोताओं तक पहुंचाने में उनके योगदान ने पहाड़ी संगीत प्रेमियों के बीच भी उन्हें खास पहचान दिलाई।
हिमाचल की लोकधुनों और संस्कृति को बड़े मंच तक पहुंचाने वाले कलाकारों में मोहित चौहान का नाम प्रदेश के संगीत प्रेमियों के लिए गर्व का विषय है। नाहन से शुरू हुआ उनका सफर आज उन युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो अपने छोटे से शहर में रहकर बड़े सपने देखते हैं।
युवाओं के लिए प्रेरणा है मोहित चौहान की कहानी
मोहित चौहान की यात्रा बताती है कि सफलता के लिए किसी बड़े शहर या बड़े मंच से शुरुआत करना जरूरी नहीं है। अपने हुनर को पहचानना, उस पर भरोसा रखना और लगातार मेहनत करते रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संगीत के प्रति उनका समर्पण और अपनी अलग पहचान बनाने का उनका प्रयास युवाओं को अपने सपनों की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
नाहन की गलियों से निकलकर लाखों श्रोताओं के दिलों तक पहुंचने वाली मोहित चौहान की आवाज हिमाचल की प्रतिभा और सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतीक है। उनकी कहानी सिर्फ एक सफल गायक की कहानी नहीं, बल्कि अपने जुनून को पहचानकर उसे जीवन का रास्ता बनाने की प्रेरणादायक मिसाल है।
नाहन से निकली आवाज, जिसने मोहब्बत को सुर दिए और बगावत को आवाज। यही हैं मोहित चौहान, हिमाचल का गौरव और The Pride of Himachal।

