हिमाचल प्रदेश के कुल्लू स्थित ढालपुर मैदान में अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के तहत देव महाकुंभ का आयोजन होगा, भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा में विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवताओं और देवलुओं के शामिल होने से उत्सव की धार्मिक और सांस्कृतिक छटा देखने को मिलेगी।
हिमखबर डेस्क
देवभूमि कुल्लू एक बार फिर आस्था, परंपरा और देव संस्कृति के महासंगम की साक्षी बनने जा रही है। बुधवार को ढालपुर मैदान में अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव का आगाज होगा और भगवान रघुनाथ की भव्य रथ यात्रा के साथ सात दिवसीय देव महाकुंभ शुरू होगा। इस दौरान जिला के 300 से ज्यादा देवी-देवता अपने लाव-लश्कर के साथ ढालपुर पहुंचकर भगवान रघुनाथ के दरबार में हाजिरी भरेंगे।
पहाड़ों की चोटियों, दूरदराज के गांवों और दुर्गम रास्तों से होकर देवताओं का आगमन शुरू हो गया है। इस बार 347 देवी-देवताओं को महापर्व के लिए आमंत्रित किया गया है और 200 के करीब देवी-देवता ढालपुर मैदान पहुंच गए हैं। बाकी देवी- देवता रथयात्रा शुरू होने से पहले ढालपुर पहुंचेंगे।
कुल्लू दशहरा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि देश के अधिकांश हिस्सों में विजयदशमी पर रावण दहन के साथ दशहरा संपन्न हो जाता है, जबकि कुल्लू में इसी दिन उत्सव का शुभारंभ होता है। यहां रामलीला और रावण दहन के बजाय भगवान रघुनाथ की रथ यात्रा, देवी-देवताओं का मिलन और सदियों पुरानी देव परंपराएं उत्सव का केंद्र रहती हैं।
यही विशिष्टता कुल्लू दशहरा को देश-दुनिया के अन्य दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती है। जहां भगवान रघुनाथजी की भव्य शोभायात्रा से दशहरा उत्सव का आगाज होगा। हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल कविंद्र गुप्ता भी रथयात्रा के साक्षी बनेंगे और सात दिवसीय दशहरा उत्सव का शुभारंभ करेंगे। समापन समारोह 26 अक्तूबर को होगा और इसके मुख्यातिथि मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू होंगे।
जिला कुल्लू देवी-देवता कारदार संघ के अध्यक्ष दोत राम ठाकुर के अनुसार दशहरा उत्सव समिति ने जिला के देवी-देवताओं को निमंत्रण भेजे हैं। विभिन्न क्षेत्रों से देवताओं का ढालपुर आगमन शुरू हो गया है। देव शिविरों में आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं। सात दिनों तक ढालपुर में आस्था, संस्कृति और लोक परंपराओं का ऐसा संगम देखने को मिलेगा, जो कुल्लू की देव संस्कृति को विश्व पटल पर विशिष्ट बनाता है।
17वीं शताब्दी से जुड़ा उत्सव का इतिहास
कुल्लू दशहरा की परंपरा 17वीं शताब्दी से राजा जगत सिंह के शासनकाल से जुड़ी है। ऐतिहासिक मान्यता के अनुसार ब्राह्मण दुर्गादत्त की मृत्यु से जुड़े घटनाक्रम के बाद राजा गंभीर पश्चाताप और बीमारी से घिर गए थे। झीड़ी के पयोहारी बाबा किशन दास की सलाह पर अयोध्या से भगवान रघुनाथ की प्रतिमा कुल्लू लाई गई।
भगवान के प्रति समर्पण के प्रतीक के रूप में राजा ने अपना राजपाट रघुनाथ जी को अर्पित कर दिया और स्वयं उनका सेवक बनकर रहने का संकल्प लिया। इसी परंपरा ने आगे चलकर कुल्लू दशहरा को विशिष्ट पहचान दी। अब ढालपुर में अगले सात दिन तक श्रद्धालुओं को अराध्य देवी-देवताओं के दर्शन का अवसर मिलेगा।

