हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित बैजनाथ का दशहरा अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, मान्यता है कि भगवान शिव की नगरी बैजनाथ में रावण दहन नहीं किया जाता, आखिर क्या है इसकी धार्मिक वजह? जानिए इस खास परंपरा के बारे में।
पालमपुर – बर्फू
देवभूमि हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला स्थित शिव नगरी बैजनाथ की धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं इसे देश के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान दिलाती हैं। जहां देशभर में विजयदशमी के अवसर पर बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है।
वहीं शिव नगरी बैजनाथ में रावण दहन की परंपरा नहीं है। यहां रावण को केवल लंकापति या रामायण के एक पात्र के रूप में ही नहीं, बल्कि भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी याद किया जाता है। बैजनाथ में रावण दहन न किए जाने के पीछे एक प्राचीन धार्मिक किंवदंती प्रचलित है। मान्यता के अनुसार हां! यह बात बिल्कुल सच है—शिव नगरी बैजनाथ (हिमाचल प्रदेश) में रावण दहन नहीं होता है और ये पूरे भारत में इकलौती ऐसी जगहों में से एक है।
इसके 3 मुख्य कारण बताए जाते हैं—
रावण शिव का सबसे बड़ा भक्त था
बैजनाथ मंदिर भगवान शिव का धाम है और इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है। कहा जाता है कि रावण ने यहीं पर कठोर तपस्या करके शिव जी से वरदान लिया था, तो जिस जगह रावण ने शिव की भक्ति की हो, वहां उसके पुतले को जलाना शिव का अपमान माना जाता है।
मंदिर के निर्माण से जुड़ी कथा
कहते हैं कि जब बैजनाथ मंदिर बन रहा था, तब रावण ने शिवलिंग को लंका ले जाने की कोशिश की थी, लेकिन शिव जी ने यहीं पर अपना स्थान बना लिया। इसलिए यहां के पुजारी और स्थानीय लोग रावण से बैर नहीं रखते, बल्कि उसे एक महान विद्वान और शिवभक्त मानते हैं। रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए इसी पवित्र भूमि पर कठोर तपस्या की थी।
भगवान शिव के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और भक्ति प्रकट करने के लिए उसने अपने दसों शीश अर्पित कर दिए थे। रावण की इस कठिन तपस्या और समर्पण से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और मनवांछित वरदान मांगने को कहा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण की इसी कठोर साधना के कारण बैजनाथ की भूमि का संबंध उसकी शिवभक्ति से जुड़ा हुआ है।
यही वजह बताई जाती है कि भगवान शिव की नगरी बैजनाथ में दशहरे के दिन रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं निभाई जाती। यहां रावण के उस स्वरूप को भी स्मरण किया जाता है, जिसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए असाधारण तपस्या की थी।
रावण दहन के प्रयासों को लेकर चर्चाएं
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी प्रचलित है कि कई वर्ष पहले कुछ लोगों ने बैजनाथ में रावण दहन करने का प्रयास किया था। बताया जाता है कि इन प्रयासों के दौरान संबंधित लोगों के साथ दुर्घटनाएं हुईं। इसके बाद से किसी ने भी यहां रावण दहन की परंपरा शुरू करने की पहल नहीं की। हालांकि इन घटनाओं के संबंध में स्वतंत्र रूप से प्रमाणित विवरण उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्थानीय मान्यता और जनचर्चा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
धार्मिक आस्था और परंपरा की अलग पहचान
शिव नगरी बैजनाथ में रावण दहन न होना यहां की विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं और लोकपरंपराओं को दर्शाता है। यहां की आस्था में रावण का एक ऐसा पक्ष भी सामने आता है, जो उसे भगवान शिव के अनन्य भक्त के रूप में प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि दशहरे के अवसर पर देश के अधिकांश हिस्सों में जहां रावण दहन प्रमुख आयोजन रहता है, वहीं बैजनाथ में इस परंपरा से दूरी बनाए रखी जाती है।
बैजनाथ की यह मान्यता दर्शाती है कि भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग रूप धारण करती हैं। कहीं दशहरा रावण दहन के माध्यम से मनाया जाता है, तो कहीं स्थानीय आस्था, पौराणिक कथाओं और सदियों से चली आ रही मान्यताओं को विशेष महत्व दिया जाता है। शिव नगरी बैजनाथ में रावण दहन न होना भी ऐसी ही एक विशिष्ट परंपरा है, जो इस प्राचीन धार्मिक नगरी को अपनी अलग पहचान प्रदान करती है।

