शिरगुल महाराज के सुप्रसिद्ध कारीगर कृपालु का 98 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उनके निधन से क्षेत्र में शोक की लहर है और लोगों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
धार पजेरा गांव के निवासी कृपालु अपने पीछे केवल एक परिवार ही नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों के लिए कला, शिल्प और सांस्कृतिक विरासत की अमूल्य धरोहर छोड़ गए हैं। देह भले ही नश्वर है, लेकिन उनके हाथों से सृजित कला और उनके द्वारा आगे बढ़ाई गई परंपरा आने वाले समय में भी उन्हें जीवंत रखेगी।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, 98 वर्ष की उम्र में भी कृपालु का पैदल आना-जाना जारी था। उनका जीवन सादगी, मेहनत और अपनी पारंपरिक कला के प्रति समर्पण का उदाहरण रहा। राजगढ़ क्षेत्र की नामी हस्ती शेरजंग चौहान के अनुसार, कृपालु कोई सामान्य कारीगर नहीं थे।
उन्हें शिरगुल देवता से जुड़े पारंपरिक और आधिकारिक कारीगरों के रूप में विशेष पहचान प्राप्त थी। शेरजंग चौहान बताते हैं कि जब लगभग 800 वर्ष पूर्व शिरगुल देवता के पहले मंदिर का निर्माण हुआ था, तो इस निर्माण कार्य से उनके पूर्वजों का संबंध रहा।
कृपालु जी उस पारंपरिक कारीगर वंश से जुड़े थे, जिसकी जड़ें शाहू नामक पूर्वज से जुड़ी मानी जाती हैं और जिसे वर्तमान में स्थानीय स्तर पर श्वाईक समुदाय के नाम से जाना जाता है।
कृपालु का निधन केवल एक बुजुर्ग कारीगर का जाना नहीं, बल्कि लोक कला और सदियों पुरानी शिल्प परंपरा के एक जीवंत अध्याय का अवसान है। हालांकि, उनके हाथों की कारीगरी और उनके द्वारा संजोई गई सांस्कृतिक पहचान आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ती रहेगी।
कृपालु भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कलाकारी और सांस्कृतिक विरासत उन्हें हमेशा अमर बनाए रखेगी। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह शोक संतप्त परिवार को इस असहनीय दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें तथा दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।
ॐ शांति। ॐ शांति। ॐ शांति।

