हिमाचल प्रदेश के चमत्कारी मंदिर, जहां होते है आश्चर्यचकित चमत्कार, एक क्लिक पर जाने इन रहस्य्मयी मंदिरों के बारे में

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हिमखबर डेस्क

देवभूमि हिमाचल प्रदेश, जहां के कण-कण में देवी देवता विराजमान हैं, जहां कई शक्तिपीठ हैं। जिस प्रदेश को भगवान भोले का घर कहा जाता है, उसी देवभूमि में कई ऐसे ऐतिहासिक और प्राचीन मंदिर भी हैं, जिनका रहस्य आज तक कोई सुलझा नहीं पाया है। गुजरते वक्त के साथ इन मंदिरों पर लोगों का विश्वास और यहां होने वाले चमत्कार बस बढ़ते ही जा रहे हैं। आज हिमाचल टॉप-10 सीरिज में हम आपको ऐसे ही 10 मंदिरों के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं।

काठगढ़ मंदिर


कांगड़ा जिले के इंदौरा में स्थित इस मंदिर में दो भागों में बंटे शिवलिंग की पूजा होती है। शिवलिंग के छोटे भाग को माता पार्वती का रूप मानाजाता है और बड़े भाग को शिव का रूप, मां पार्वती और भगवान शिव के दोनों भागों के बीच का अंतर घटता बढ़ता रहता है। यह अंतर ग्रहों व नक्षत्रों के परिवर्तित होने के अनुसार ही बदलता रहता है।

कहा जाता है कि गर्मियों में इन दोनों भागों के बीच काफी अंतर आ जाता है, वहीं सर्दियों में अंतर कम हो जाता है और दोनों शिवलिंग एक रूप धारण कर लेते हैं। इसके अलावा इस शिवलिंग के मिलने-बिछडऩे को शिव पार्वती के अनोखे मिलन के रूप में देखा जाता है।

अघंजर महादेव मंदिर


अघंजर महादेव मंदिर, जो कि धर्मशाला के खनियारा में स्थित है, जहां 5 या 10 साल से नहीं, बल्कि 500 से ज्यादा वर्ष पहले से अखंड धूना जल रहा है। मान्यता है कि ये बाबा गंगा भारती का धूना है, बाबा यहां पर तपस्या में लीन रहते थे। मान्यता है कि इस धूने की विभूती में पेट व अन्य असाध्य रोगों के निवारण की ताकत है। कहा जाता है राजा रणजीत सिंह के असाध्य रोग को बाबा ने अपने धूने की विभूती से ठीक किया था।

बाबा पर प्रसन्न होकर राजा रणजीत सिंह ने बाबा गंगा भारती को बहुत ही सुंदर व आकर्षक दुशाला भेंट किया, मगर राजा के घमंड को तोडऩे के लिए इसे अग्निकुंड (धूने) में डाल दिया, जिसके बाद राजा क्रोधित हो गए। कहा जाता है कि राजा को ज्ञान देने व अहंकार नष्ट करने के लिए बाबा ने फिर धूने में चिमटा गाड़ कर सैकड़ों दुशाला निकाल दी थी और राजा को पहचानने के लिए कहा था, जिसके बाद राजा को गलती का एहसास हुआ। रही बात धूने की तो वो आज तक जस का तस जल रहा है।

शिकारी देवी मंदिर्


यह धार्मिक स्थल मंडी जिले में भी स्थित है। यह जंजैहली नामक स्थान से 17-18 किमी की दूरी पर है। शिकारी शिखर की पहाडिय़ों पर स्थित शिकारी देवी मंदिर एक ऐसा मंदिर है, जिस पर आज तक कोई छत नहीं बनाई गई है। हैरान कर देने वाली बात यह है कि यहां पर हर साल सर्दियों में कई फुट बर्फ गिरती है, लेकिन मूर्तियों के स्थान पर कभी भी बर्फ नहीं टिकती है, जो किसी चमत्कार से कम नहीं है. वर्षो-वर्ष कई कोशिशों के बाद भी इस रहस्यमय मंदिर की छत नहीं बन पाई।

मान्यता है कि मार्कंडेय ऋषि ने इस जगह पर कई साल तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर मां दुर्गा अपने शक्ति रूप में इस जगह पर स्थापित हुई थी। इस स्थान पर अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी तपस्या की। पांडवों की तपस्या से खुश होकर मां दुर्गा प्रकट हुई और पांडवों को युद्ध में जीत का आशीर्वाद दिया।

हाटकोटी मंदिर


यह मंदिर शिमला से लगभग 110 किमी. की दूरी पर स्थित है। मान्यता है कि इस प्राचीन मंदिर का निर्माण 700-800 वर्ष पहले हुआ था। मंदिर के गर्भगृह में महिषासुर मर्दिनी की विशाल मूर्ति है। यह मूर्ति किस धातु की है, इसकी कोई सटीक जानकारी नहीं है, लेकिन इस मंदिर में एक ऐसा कलश है, जो रहस्यों से भरा हुआ है। मंदिर के बाहर प्रवेश द्वार के बाईं ओर एक ताम्र कलश रखा हुआ, जिसका आकार काफी बड़ा है।

हैरान करने वाली बात यह है कि इसे लोहे की जंजीर से बांधा गया है, इसके गले में लोहे की जंजीर बंधी है। कहा जाता है कि इस जंजीर का दूसरा सिरा मां के पैरों से बंधा है। जब बरसात में पब्बर नदी में अत्यधिक बाढ़ आती है, तब हाटेश्वरी मां का यह चरू सीटियों की आवाज निकालता है और भागने का प्रयास करता है। इसलिए चरू को मां के चरणों के साथ बांधा गया है।

कमरुनाग मंदिर


यह मंदिर मंडी जिला से 51 किलोमीटर दूर करसोग घाटी में स्थित है। प्रकृति प्रेमियों के लिए कमरुनाग मंदिर की यात्रा स्वर्ग की यात्रा है। खड़ी पहाड़ी पर ट्रैक कर जब आप यहां पहुचते हो, तो मानों दिल को सुकून मिल जाए, लेकिन ये मंदिर अपने प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि जाना जाता है, अपने रहस्यमय झील के लिए। मान्यता है कि इस झील में अरबों का खजाना है, मगर इसे कोई निकाल नहीं सकता।

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस झील का निर्माण यक्षों के राजा के सम्मान में किया गया था और इसका उल्लेख महाभारत में भी किया गया है। पांडवों में से एक भीम ने इस झील का निर्माण किया था। माना जाता है कि यक्ष पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर छिपे धन के दिव्य संरक्षक हैं। इसी मान्यता के आधार पर लोग आज भी इस झील पर आते हैं और श्रद्धा अनुसार सोना चांदी चढ़ाते हैं।

ऐसा माना जाता है कि इस झील में सोना और चांदी चढ़ाने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि कई बार चोरों ने इस झील के नीचे स्थित धन को चुराने के कई प्रयास किए, मगर यह सभी प्रयास निरर्थक साबित हुए। क्योंकि झील की रक्षा स्वयं कमरुनाग देवता करते हैं।

बिजली महादेव मंदिर


बिजली महादेव मंदिर के चमत्कार की चर्चा दुनिया भर में है। कहा जाता है कि यहां भोलेनाथ के ऊपर बिजली गिरती है। यह बिजली केवल शिवलिंग से टकराती है। इससे मंदिर या किसी जानमाल को कोई नुकसान नहीं होता है, जिसके पश्चात शिवलिंग कई टुकड़ों में बंट जाता है, लेकिन इससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि मंदिर के पुजारियों द्वारा एक प्राचीन लेप से जोड़े जाने पर यह शिवलिंग पुन: जुड़ जाता है।

कहते हैं कि लेप के लिए कुछ प्राचीन सामग्री व दाल के आटे, अनाज और मक्खन आदि से बने पेस्ट का उपयोग किया जाता है। हालांकि इस रहस्य को अभी तक कोई समझ नहीं पाया है कि ऐसा आखिर कैसे हो सकता है।

बैजनाथ शिव मंदिर

इस मंदिर के बारे में आप जानते होंगे, यह वही मंदिर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि रावण ने तपस्या की थी। बैजनाथ में आज भी रावण का मंदिर और कुंड मौजूद है। यहां लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपने नौ सिरों को काटकर कुंड में जला दिया था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि रावण की तपोस्थली रही बैजनाथ में भारत का प्रमुख पर्व दशहरा पर्व नहीं मनाया जाता है। दशहरे के दिन रावण का पुतला नहीं जलता।

कहा जाता है कि अगर कोई रावण का पुतला जलाता है, तो उसकी मृत्यु हो जाती है। साल 1965 में बैजनाथ में एक भजन मंडली में शामिल कुछ बुजुर्ग लोगों ने उस समय बैजनाथ मंदिर के ठीक सामने रावण का पुतला जलाने की प्रथा शुरू की। यही नहीं, यहां एक विचित्र बात यह भी है कि यहां कोई भी सोने की दुकान नहीं है। माना जाता है कि कोई यहां सोने की दुकान खोलता है, तो उसका व्यापार तबाह हो जाता है या दुकान नहीं चलती। जानकारी है कि यहां दो बार सोने की दुकान खोली गई, लेकिन दुकान नहीं चल पाई

रॉक कट टेंपल


रॉक कट टेंप कांगड़ा जिला के मसरूर गांव में स्थित यह मंदिर एक ही चट्टान को काटकर बनाया गया है, जिसे अजंता-एलोरा ऑफ हिमाचल भी कहा जाता है। पुरातत्व विभाग के अनुसार शायद 8वीं सदी में बना हो, मगर पत्थरों पर ऐसी खूबसूरत नक्काशी करना बेहद मुश्किल काम है। यह कारीगरी किसने की इसके आज तक पुख्ता सबूत नहीं मिल पाए हैं। पहाड़ काट कर गर्भ गृह, मूर्तियां, सीढिय़ां और दरवाजे बनाए गए हैं। मंदिर के बिल्कुल सामने मसरूर झील है, जो मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगाती है।

कुछ लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान किया। बलुआ पत्थर को काटकर बनाए गए इस मंदिर को 1905 में आए भूकंप के कारण काफी नुकसान भी हुआ था। इसके बावजूद ये आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मुख्य मंदिर पर भगवान श्रीराम राम, लक्ष्मण और सीता की छवियां अंकित की गई हैं। साथ ही भगवान शिव की भी एक कलाकृति यहां है।

सिमसा माता मंदिर


आप यह सुनकर हैरान हो जाएगें, कि ये एक ऐसा मंदिर है, जहां पर सोने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। संतान सुख की प्राप्ति के लिए आज भी हिमाचल के जिला मंडी के लड़भड़ोल स्थित सिमस गांव में स्थित शारदा सिमसा मां के मंदिर में नवरात्र के दौरान देशभर से हजारों महिलाएं पहुंचती हैं। इसे महिलाओं का धरना कहा जाता है।

धरने में मां किसी भी रूप में स्वप्न में आकर महिला श्रद्धालुओं को फल के रूप संतान का आशीर्वाद देती है। साथ लगती बावड़ी के पानी से स्नान कर महिलाएं यहां पर धरना देती हैं। यह भी कहा जाता है कि एक बार मां के आदेश के बाद भी कोई महिला फिर मंदिर में स्नान कर धरने पर जाती है, तो महिला को खुजली होना शुरू हो जाती है। इस मंदिर में न केवल हिमाचल ब्लकि अन्य कई राज्यों से भी महिलाएं आती हैं।

बाबा भैरव

कांगड़ा के बज्रेश्वरी धाम में विराजमान बाबा भैरव का मंदिर- पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि जब भी आस-पास के क्षेत्र में किसी प्रकार का संकट आने वाला होता है, तब बाबा भैरव की मूर्ति की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगती है।

मूर्ति से आंसू निकलते देख वहां के पुजारी संकट से बचने के लिए एक विशेष पूजा-पाठ शुरु कर देते हैं। बाबा भैरव की इस मूर्ति को लगभग पांच हजार साल पुराना बताया जाता है। भैरव बाबा के इन बहते आंसुओं के पीछे क्या रहस्य छिपा है यह आज तक कोई नही जान पाया है।

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