
मंदिर के मुख्य द्वार पर प्राचीनता और बहुमूल्यता के अनुरूप भरे जा रहे खास तरह के रंग
काँगड़ा – राजीव जस्वाल
माता बज्रेश्वरी देवी मंदिर के मुख्य द्वार पर हुई चित्रकला को एक सदी के बाद पुन: संजीव किया जा रहा है। वर्ष 1920 में हुई दुर्गा सप्तशति, कृष्ण लीला पर आधारित यह चित्रकला आने वाले श्रद्धालुओं को अपनी सुंदरता के कारण भक्ति भाव व प्रसन्न चित कर देती है।
चित्रकला की प्राचीनता व बहुमूल्यता के अनुरूप ही रंग भरे जा रहे हैं। राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित विभिन्न मंदिरों में कार्यरत चित्रकार धनी राम खुशदिल, मुकेश धीमान व जोगिंदर सिंह इस कार्य को कर रहे हैं।
चित्रकारों ने बताया कि इस कार्य को करने के लिए लगभग तीन महीने का समय लग सकता है । मुख्य द्वार पर हुई चित्रकला में मां दुर्गा के विभिन्न रूप व राक्षसों से युद्ध करते हुए बड़े सुंदर ढंग से दिखाया गया है। इन चित्रों की सुंदरता व भाव प्रदर्शन पहाड़ी चित्रकारों की कलाकारी दूरदर्शी सोच को दर्शाता है।
माता बज्रेश्वरी देवी मंदिर के प्रवेश द्वार पर बनी सौ साल पुरानी कांगड़ा चित्रकला के खराब हालत से मां के भक्तों की भावनाएं आहत हो रही थीं। माता मंदिर के प्रवेश द्वार की छत पर इस कांगड़ा चित्रकला को एक सदी पहले कांगड़ा के चित्रकारों ने बड़ी शिद्दत के साथ बनाया था।
पेंटिंग में माता के इतिहास को साल 1914 में लाला श्यामनरायण, गुलाबु राम व भुरू राम चित्रकारों से बनवाया था । पेंटिंग में माता बज्रेश्वरी देवी के इतिहास का वर्णन कांगड़ा चित्रकला के माध्यम से बड़ी बारीकी से किया गया है ।
अब यह कांगड़ा चित्रकला पूरी तरह से खराब हो गई थी। पहले कांगड़ा पेंटिंग के चित्रकारों ने इसके संरक्षण की बात मंदिर प्रशासन से की थी। देर से ही सही इस कार्य को मुकम्मल करने की कवायद शुरू हो गई है। इसे तीन महीने के भीतर पूरा कर लिया जाएगा।
