ट्रस्ट की कैंटीन से लिया गया प्रसाद का सैंपल कंडाघाट लैब की परख में नहीं हुआ पास
हिमखबर – व्यूरो रिपोर्ट
उत्तरी भारत की प्रसिद्ध सिद्धपीठ दियोटसिद्ध स्थित बाबा बालक नाथ मंदिर में चढ़ाए जाने वाले रोट के प्रसाद की गुणवत्ता पर उठ रहे सवालों पर कंडाघाट लैब ने मुहर लगा दी है। लैब से आए रोट के सैंपल की जांच में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। जांच रिपोर्ट में रोट के सैंपल फेल पाए गए हैं।
जांच में पाया गया है कि स्वास्थ्य की गुणवत्ता के दृष्टि से ये रोट खाने लायक नहीं है। कंडाघाट लैब की जांच रिपोर्ट ने एक साथ कई सवाल भी खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि काफी लंबे समय से लाखों की संख्या में लोग प्रसाद के रूप में रोट को खा रहे हैं, लेकिन वह पूरी तरह से इसकी गुणवत्ता को लेकर बेखबर हैं।
ऊपर से लोग कई बार महीना तक इस रोट को घर में रख लेते हैं और प्रसाद के रूप में इसे ग्रहण करते रहते हैं। सबसे बड़ी चौंकाने वाली बात यह भी है कि जो सैंपल फेल हुआ है, वह देवाशिष्ठित की कैंटीन का बताया जा रहा है।
विभिन्न राज्यों के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बाबा बालक नाथ मंदिर में चढ़ाए जाने वाले रोट को लेकर भी जब सवाल उठे, तो अक्तूबर महीने में फूड एंड सेफ्टी विभाग की टीम ने मंदिर की दुकानों में औचक दस्तक देकर यहां मंदिर की कैंटीन और विभिन्न दुकानों में बनाए जाने वाले रोट के सैंपल भरे थे।
दियोटसिद्ध में अप्पर और लोअर बाजार में दुकानों की बात करें, तो यहां लगभग अढ़ाई सौ दुकानें हैं, जिनमें से 70 से 80 दुकानों में रोट प्रसाद बनाया जाता है। गौरतलब है कि बाबा बालक नाथ जी का मंदिर हिमाचल, पंजाब समेत कई राज्यों यहां तक कि विदेशों में बसे बाबा के श्रद्धालुओं का भी आस्था का केंद्र है।
यहां हर साल एक महीने तक लगने वाले चैत्र महीने के अलावा पूरा साल भक्तों का मंदिर में आना लगा रहता है। रविवार को अन्य दिनों की अपेक्षा काफी संख्या में बाबा के भक्त यहां पहुंचते हैं और रोट प्रसाद के रूप में पौणाहारी को अर्पित किया जाता है, जिसे बाद में बाबा के भक्त खुद भी खाते हैं और अपने घरों के लिए भी लेकर जाते हैं।
दुकानदार देते हैं यह तर्क
बाबा जी का रोट आटा, मैदा, डालडा घी या रिफाइंड, चीनी और गुड़ इत्यादि वस्तुओं से बनाया जाता है। दुकानदारों की मानें तो मंदिर में प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाने वाला रोट एक महीने तक खराब नहीं होता, बशर्ते उसमें पानी न लगे। बरसात के मौसम में इसे नमी से बचाना होता है। वैसे ज्यादातर रोट ताजे बनाकर ही बेचे जाते हैं। यह दुकानदारों का अपना तर्क है, साइंटिफिक रूप से इसकी कोई प्रमाणिकता नहीं है।

