
यादों में सिमट कर रह गए सावन के माह में पड़ने वाले झूले, गाँवो में विलुप्त होने की कगार पर है सावन माह की संस्कृति- शशि राणा
भलाड – शिबू ठाकुर
आधुनिकता की दौड़ में संस्कृति पीछे छूटती जा रही है और पुरानी परंपराएं विलुप्त होने की कगार पर हैं। शिव शक्ति युवा क्लब के मीडिया प्रभारी शशि राणा ने कहा कि एक समय था कि सावन आने का लोग बेसब्री से इंतजार करते थे। साथ ही सावन माह के आगमन से पहले ही गली – गाँव में पेडों पर झूले पड़ने की तैयारियां होने लगती थीं।
सावन माह की शुरूआत होते ही पेडों पर झूले पड़ जाते थे। पेडों पर पड़े झूले को झूलने के लिए सहेलियां समूह बनाकर झूला झूलने पहुँचती थीं एवं सभी आपस में सावन के गीत गाती थीं।
लेकिन आज के समय में पुरानी परंपराओं की जगह फेसबुक फ्रेंड्स ने ले ली है। सोशल मीडिया पर लोग इतने एक्टिव हो गए हैं की वह अपनी संस्कृति और पुरानी परंपराओं को भूलते जा रहे हैं। शशि राणा ने कहा कि आधुनिकता की दौड़ में संस्कृति और पुरानी परंपराएं पीछे छूटती जा रही हैं।
अब ना ही किसी गांव में झूले दिखाई देते हैं और ना ही कहीं सावन के गीतों की धुन सुनाई देती है। पुराने समय में मनोरंजन के सीमित साधन थे। इसलिए त्योहारों में लोग आपसी भाईचारा बढ़ाने के साथ-साथ मनोरंजन भी करते थे। सावन का पूरा महीना त्योहार के रूप में मनाया जाता था।
इसलिए पहले सावन माह में झूला झूलने और सावन के गीत गाने की परंपरा होती थी। वहीं पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे इससे परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे से जुड़े रहते थे। आज के समय में ज्यादातर परिवार एकल परिवार हो गए हैं इससे आपस में दूरियां बढ़ती जा रही हैं।
जर्नलिस्ट शशि राणा ने कहा कि जिंदगी की भागदौड़ और व्यस्तताओं के बीच सावन की मस्ती कहीं गुम हो गई है। गांवों में पेड़ों पर पड़े झूले और उनके दृश्य अब विरासत बनते जा रहे हैं।
