हंसता-खेलता शहर नहीं, पूरी संस्कृति ही डूब गई थी

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हिमखबर डेस्क

9 अगस्त, 1961 को पहली बार भाखड़ा बांध का जलस्तर बढ़ा था, जिसमें बिलासपुर का पुराना शहर डूब गया था। इस शहर का डूबना एक संस्कृति का डूबना माना गया था, क्योंकि गोबिंदसागर झील में कहलूर रियासत का रंगमहल व नया महल के साथ साथ पुराने महल शिखर शैली के 99 मंदिर, स्कूल, कालेज, पंचरुखी नालयां का नौण, दंडयूरी, बांदलिया, गोहर बाजार, सिक्खों का मुड में गुरुथान, गोपालजी मंदिर और कचहरी परिसर भी डूबा था।

अब गोबिंदसागर झील का जलस्तर कम होने से कहलूर रियासत के ऐतिहासिक मंदिर एक बार फिर सांडू में नजर आना शुरू हो गए हैं। धीरे-धीरे जल स्तर कम होने के बाद मंदिरों के गुंबद पानी की सतह पर तैरते से नजर आने लगे हैं। करीब चार माह पूर्व मंदिर हर वर्ष की तरह जलमग्न हो गए थे, जो पानी कम होने के बाद बाहर आ रहे हैं।

यह नजारा स्थानीय लोगों के साथ साथ अन्य लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन रहा है। अब लगातार जिस तरह से जलस्तर कम होता जाएगा, वैसे-वैसे मंदिर पूरी तरह से पानी से बाहर आ जाएंगे। हालांकि, कई मंदिर सिल्ट के नीचे दब गए हैं।

बस कुछ ही मंदिर बचे हैं, जो हर साल गोबिंदसागर झील में कुछ माह के लिए जल समाधि लेते हैं और फिर पानी कम होने के बाद बाहर आते हैं। फरवरी माह तक ये मंदिर पूरी तरह दिखाई देने लगेंगे। बताते चलें कि भाखड़ा बांध बनने के बाद वर्ष 1960 में कहलूर रियासत के दर्जनों ऐतिहासिक मंदिर गोबिंदसागर झील में समा गए थे।

यह हैं मुख्य मंदिर

हर वर्ष गोबिंदसागर झील में जलमग्न होने वाले मंदिरों में रंगनाथ मंदिर, खनेश्वर, नारदेश्वर, गोपाल मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, बाह का ठाकुरद्वारा, ककड़ी का ठाकुरद्वारा, नालू का ठाकुरद्वारा और खनमुखेश्वर मंदिर शामिल हैं। जो हर साल जलस्तर बढऩे पर डूब जाते हैं और पानी उतरते ही फिर उभर आते हैं।

हम बचपन से देख रहे हैं यह प्रकिया

स्थानीय युवाओं महेश, मनोज, अनूप, अजय शर्मा, गौरव व वरुण का कहना है कि हम बचपन से इस प्रक्रिया को लगातार देखते आ रहे हैं। हर वर्ष यह ऐतिहासिक मंदिर जुलाई माह के बाद जलमग्न होना शुरू हो जाते हैं। अब जैसे ही मंदिर बाहर आएंगे, तो यहां स्थानीय लोगों के साथ साथ बाहरी जिलों व राज्यों के लोगों की आवाजाही शुरू हो जाएगी। कई लोग यहां पिकनिक का आनंद लेने भी पहुंचते हैं।

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