हिमाचल: दिवाली के एक माह बाद गिरिपार, सराज घाटी सहित आनी और निरमंड में बूढ़ी दिवाली पर्व की धूम

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हिमखबर डेस्क

देशभर में भले ही दीपावली का त्योहार ठीक एक माह पहले मनाया जा चुका है, पर सिरमौर के कई इलाके ऐसे भी हैं, जहां दिवाली नहीं बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है।

सिरमौर के गिरिपार इलाके की 100 के करीब पंचायतों में इसका आगाज हो चुका है। इसके अतिरिक्त कुल्लू के आनी, निरमंड व मंडी की सराज घाटी में भी इस पर्व की धूम है। इस पर्व को मनाने के पीछे कई धार्मिक मान्यताएं हैं।

अकसर सुनने को यही मिलता है कि गिरिपार इलाके के लोगों को राम के अयोध्या लौटने का पता एक माह देरी से चला। इस वजह से यह पर्व बूढ़ी दिवाली के तौर पर मनाया गया। कई लोग इसे स्वीकारते हैं। कई में इसे लेकर संशय है। कई क्षेत्रों में इस त्योहार को मनाने की पीछे फसलों के भंडारण में देरी तो कई दैत्यराज बली से भी जोड़ते हैं।

सिरमौर के शिलाई इलाके की सभी 35 पंचायतों में इस त्योहार को धूमधाम से मनाया जाएगा। इन पंचायतों में पांच दिनों तक पारंपरिक व्यंजनों के साथ मेहमानों की खातिरदारी होगी। कई जगह सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। इसके अलावा संगड़ाह उपमंडल और राजगढ़ विकासखंड की कुछेक पंचायतों में भी इस त्योहार को मनाया जाएगा।

संगड़ाह इलाके में इस त्योहार को मशराली के नाम से जाना जाता है। संगड़ाह और राजगढ़ की कई पंचायतों में दिवाली के साथ-साथ बूढ़ी दिवाली भी मनाते आ रहे हैं।  कई जगह ब्रह्म मुहूर्त में भी मशाल जुलूस निकाले गए। तीन से पांच दिन चलने वाले इस आयोजन में मेहमानों की खूब खातिरदारी होगी।

इस दौरान असकली, घेंडा (मीठा आटा), बेढ़ोली, उलोले, गुलगुले, मूड़ा, तेलवा, शाकुली, तिल, भागंजीरा, चौलाई लडडू, सूखे मेवे आदि व्यंजनों का स्वाद चखेंगे। वहीं, मंडी जिला के सराज घाटी के चेत में अनोखे रूप से यह पर्व मनाया जाता है।

मंगलवार रात घाटी के चेत गांव में लोग आग के मशाल लेकर जब नृत्य करने लगे तो पूरा गांव बूढ़ी दिवाली के जश्न में झूम उठा। वैदिक काल से आज भी पुरातन परंपरा का निर्वाह किया जाता है। इस पर्व में लोगों की पुरातन संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

प्रकाशोत्सव के प्रतीक के तौर पर यहां पर मशालें जलाई जाती हैं, पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप पर लोग झूम उठते हैं। अधिवक्ता एवं समाजसेवी हेम सिंह ठाकुर बताते हैं कि यह पर्व वैदिक काल से चला आ रहा है। इसका वर्णन ऋग्वेद में भी मिलता है।

बूढ़ी दिवाली क्यों मनाई जाती है

शिक्षाविद पंडित लायकराम शास्त्री के अनुसार वास्तव में बूढ़ी दिवाली सतयुग के समय से चली आ रही है। श्रीमद्भागवत में इस घटना की कथा का वर्णन है जब वृत्तासुर का अत्याचार चरम पर था।

उससे निजात पाने के लिए देवता लोग ब्रह्मा जी के पास गए। ब्रह्मा जी ने कहा कि इसका वध मात्र महर्षि दधीची के अस्थि पिंजर से बने अस्त्र से होगा। सभी देवता महर्षि दधीची के पास पहुंचे।

देवताओं की बात सुन उन्होंने योगबल से प्राण त्यागे। देवताओं ने उस अस्थि पिंजर का दिव्यास्त्र बनाकर वृत्तासुर पर आक्रमण कर वध उत्तराखंड की हिमाचल के साथ लगती पहाड़ियों के ऊपर हुआ।

इससे प्रसन्न होकर लोगों ने मार्गशीर्ष की अमावस्या के दिन मोटी-मोटी लकड़ियों को जलाकर अग्निकुंड के चारों तरफ मशालें जलाकर नाचना शुरू किया। तभी से इस बूढ़ी दीपावली के पर्व को मनाया जाता है।

अग्नि के चारों ओर बनाया जाता है लोगों का सुरक्षा चक्र

आनी क्षेत्र में बूढ़़ी दिवाली पर्व मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है। कई क्षेत्रों में बूढ़ी दिवाली पर्व का इतिहास राजा बलि से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन निरमंड में मनाई जाने वाली बूढ़ी दिवाली के पर्व का उल्लेख ऋगवेद में भी आता है।

अग्नि के चारों ओर क्षेत्र के गढ़ के लोगों का एक सुरक्षा चक्र बनाया जाता है, जिसे देवताओं का प्रतीक माना जाता है।उसके बाद सुबह चार बजे दूसरे गढ़ के लोग यहां आकर इस घेरे की सुरक्षा में खड़े लोगों के साथ युद्ध की परंपरा का निर्वहन करते हैं।

निरमंड की प्रसिद्ध अंबिका माता और भगवान परशुराम मंदिर कमेटी के कारदार पुष्पेंद्र शर्मा कहना है कि इस ऐतिहासिक बूढ़ी दिवाली को मनाने की परंपरा सदियों पुरानी है।

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