हिमाचल: कांग्रेस से बागी होकर भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायकों को HC से बड़ी राहत, पेंशन जारी करने के आदेश

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हिमखबर डेस्क

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस से बागी होकर भाजपा में शामिल हुए पूर्व विधायकों को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने अयोग्य घोषित किए गए इन बागी विधायकों को विधानसभा से मिलने वाली पेंशन जारी करने के आदेश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और विधानसभा सचिवालय को निर्देश दिए कि पात्र याचिकाकर्ताओं की बकाया और नियमित पेंशन एक माह के भीतर जारी की जाए।

हिमाचल हाईकोर्ट ने ये फैसला दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुनाया है। हिमाचल हाईकोर्ट में पूर्व विधायक राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर की ओर से अलग-अलग याचिकाएं दायर की गई थी।

आदेश का पालन नहीं करने पर क्या होगा?

आदेशों का पालन नहीं होने की स्थिति में 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा। यह आदेश जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ ने दिए। कोर्ट में राजेंद्र राणा और रवि ठाकुर द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की गई थी, जिनमें पेंशन जारी करने की मांग की गई थी।

बता दें कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए जाने के बाद से ये बागी विधायक पेंशन से वंचित थे। हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद भाजपा ने सुक्खू सरकार पर जुबानी हमला किया है।

भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा सुक्खू सरकार पर बरसे

हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सुक्खू सरकार की राजनीति ‘समान दृष्टि’ नहीं बल्कि ‘बदले की भावना’ पर आधारित है। भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सत्ता में आते ही झूठ गढ़ने, विपक्ष को निशाना बनाने और विरोध करने वाले नेताओं को परेशान करने की नीति अपनाई, लेकिन अब न्यायालय के फैसले ने उनके इस एजेंडे पर सीधा प्रहार किया है।

उच्च न्यायालय ने अपने आदेश दिनांक 07.04.2026 में स्पष्ट किया कि हिमाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित संशोधन विधेयक की प्रभावशीलता पूर्व प्रभाव नहीं हो सकती और यह केवल भविष्य के लिए ही लागू होगा। न्यायालय ने साफ निर्देश दिए कि संबंधित पूर्व विधायकों को उनकी पेंशन एवं बकाया राशि एक माह के भीतर जारी की जाए, अन्यथा राज्य को 6% वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा।

‘कानून किसी व्यक्ति विशेष को टारगेट करने के लिए नहीं बनाए जाते’

भाजपा प्रवक्ता आशीष शर्मा ने तीखा प्रहार करते हुए कहा यह फैसला सुक्खू सरकार के गाल पर तमाचा है। कांग्रेस ने कानून को बदले का हथियार बनाने की कोशिश की, लेकिन न्यायालय ने साफ कर दिया कि कानून किसी व्यक्ति विशेष को टारगेट करने के लिए नहीं बनाए जाते, बल्कि भविष्य के लिए बनाए जाते हैं।

उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया 2024 का संशोधन बिल, जिसमें अयोग्य घोषित विधायकों (10वीं अनुसूची) की पेंशन रोकने का प्रयास किया गया, पूरी तरह राजनीतिक द्वेष से प्रेरित था। लेकिन सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसे वह बिल वापस लेना पड़ा।

इसके बाद 2026 में नया संशोधन लाया गया, जिसकी सीमा केवल 14वीं विधानसभा के बाद के विधायकों तक सीमित रखी गई—यह स्वयं साबित करता है कि पहले किया गया कदम गलत और असंवैधानिक था।

‘यह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण’

आशीष शर्मा ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने दो वर्षों तक पूर्व विधायकों को मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया। उनकी वैध पेंशन रोकी गई, उन्हें न्याय के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़े- यह लोकतंत्र नहीं, राजनीतिक प्रतिशोध का उदाहरण है।

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची का दुरुपयोग करते हुए पेंशन रोकने का प्रयास किया गया, जबकि यह प्रावधान केवल सदस्यता समाप्ति तक सीमित है, न कि पूर्व अधिकारों को समाप्त करने के लिए। कांग्रेस सरकार ने संविधान को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश की, लेकिन न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया कि कानून के साथ ‘मनमानी’ नहीं चलेगी।

‘फैसला संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत’

आशीष शर्मा ने आगे कहा कि यह पूरा प्रकरण कांग्रेस सरकार की ध्यान भटकाने की राजनीति का उदाहरण है जहां अपनी विफलताओं से ध्यान हटाने के लिए मुद्दों को भटकाया जाता है और विपक्ष को टारगेट किया जाता है। पहले दिन से ही कांग्रेस सरकार की एक ही सोच रही कि झूठ कैसे गढ़ना है, विपक्ष को कैसे दबाना है और विरोध करने वालों को कैसे परेशान करना है। लेकिन अब अदालत ने सच्चाई सामने ला दी है। उन्होंने कहा कि यह फैसला केवल पूर्व विधायकों की जीत नहीं, बल्कि रूल ऑफ लॉ, संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीत है।

अंत में भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि भाजपा इस मुद्दे को प्रदेश की जनता के बीच लेकर जाएगी और बताएगी कि कैसे कांग्रेस सरकार ने कानून का दुरुपयोग कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास किया। यह सरकार ‘बदले की भावना’ से चल रही है, न कि ‘समान दृष्टि’ से और अब जनता भी इसका जवाब देने के लिए तैयार है।

पूरा मामला क्या है?

बता दें कि कांग्रेस के छह विधायकों ने फरवरी 2024 में राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोट किया था। इसके बाद स्पीकर कुलदीप सिंह पठानिया ने उन्हें अयोग्य ठहराया। इसके बाद इन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया था। इसके बाद कांग्रेस सरकार ने इनकी पेंशन रोकने के लिए 2024 में विधानसभा में संशोधन विधेयक लाया। हालांकि, इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी नहीं मिल पाई।

इसके बाद सुक्खू सरकार ने विधानसभा के हाल में संपन्न बजट सेशन में दोबारा संशोधन विधेयक लाया। इसमें अब यह प्रावधान किया गया कि 14वीं विधानसभा या फिर भविष्य में जो भी विधायक अयोग्य ठहराए जाएंगे उनकी पेंशन बंद होगी। अब यह बिल राज्यपाल की मंजूरी को भेजा जाएगा। यदि राज्यपाल की मंजूरी मिली तो 14वीं विधानसभा के कुटलैहड़ से पूर्व विधायक देवेंद्र कुमार भुट्टो और गगरेट से चैतन्य शर्मा की पेंशन भी बंद हो जाएगी।

सत्ता बदले के लिए नहीं, बदलाव के लिए होती है : जयराम ठाकुर 

पूर्व मुख्यमंत्री एवं नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने व्यवस्था परिवर्तन वाली सुक्खू सरकार के कानून को असंवैधानिक बताते हुए कांग्रेस के बागी विधायकों की पेंशन की बहाली के आदेश का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि यह न्याय की जीत है और बदले की भावना से की जा रही कार्रवाई और तानाशाही की हार है। सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर लगातार असंवैधानिक कार्य करती जा रही है, जिसके कारण आए दिन माननीय न्यायालय में सरकार की फजीहत होती है।

आज अपने फैसले में माननीय न्यायालय द्वारा सरकार पर की गई टिप्पणी ‘कानून बदले के लिए नहीं, भविष्य के लिए होते हैं’ सरकार की हर असंवैधानिक गतिविधि पर एक तमाचा है। मुख्यमंत्री को समझना चाहिए कि सत्ता उनके अहं की संतुष्टि और राजनीतिक प्रतिशोध का साधन नहीं है।

जयराम ठाकुर ने कहा कि प्रदेश की विधानसभा को मुख्यमंत्री के राजनीतिक प्रतिशोध का मंच बनने से रोकने के लिए हमने स्पीकर से गुहार भी लगाई थी। विधानसभा में यह बात हमने लगातार कही, बार-बार कही कि ऐसे कानून मत बनाओ जो कानून की कसौटी पर एक मिनट भी न टिक पाएं।

इस माननीय सदन में बनाया गया कानून अगर अदालत में संविधान की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है, तो इससे इस माननीय सदन की गरिमा गिरती है। इस सदन की एक गरिमा है, उसका ध्यान रखा जाए। हमने विधानसभा के भीतर भी माननीय विधानसभा अध्यक्ष को आगाह किया था कि राजनीतिक प्रतिशोध की भावना में ऐसे कानून बनाने की इजाजत न दें, जो कानून की कसौटी पर एक मिनट भी न टिक पाएं।

जयराम ठाकुर ने कहा कि एक नहीं, दर्जनों बार इस सरकार के नीतिगत फैसले माननीय उच्च न्यायालय द्वारा असंवैधानिक ठहराते हुए खारिज किए गए हैं। हर दिन मुख्यमंत्री के असंवैधानिक कार्यों की वजह से हिमाचल प्रदेश चर्चा में होता है और पूरे प्रदेश की किरकिरी होती है।

यह सरकार व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर संविधान की धज्जियाँ उड़ाने से बाज नहीं आ रही है। सलाहकारों और वकीलों की फौज के बावजूद भी मुख्यमंत्री हर दिन असंवैधानिक फैसले क्यों लेते हैं, जिससे प्रदेश के संसाधन और सरकार की ऊर्जा न्यायालय में खर्च होती है।

सिर्फ पंचायत चुनाव में ही मुख्यमंत्री को पांच बार माननीय उच्च न्यायालय की फटकार पड़ चुकी है। व्यवस्था परिवर्तन वाली सुक्खू सरकार का शायद ही कोई नीतिगत फैसला होगा, जो कानून की कसौटी पर खरा उतर पाया हो। मुख्यमंत्री से निवेदन है कि राजनीतिक प्रतिशोध के बजाय बड़े दिल से, खुले मन से प्रदेशवासियों के हितों के लिए काम करें।

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