सफलता की कहानीः हल्दी की खेती से सफलता की कहानी लिख रही महिलाएं

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हल्दी के लिए समर्थन मूल्य घोषित करने पर मुख्यमंत्री को कहा थैंक्यू।

मंडी – अजय सूर्या 

मंडी जिला के धर्मपुर क्षेत्र की महिलाएं पारंपरिक खेती से हटकर हल्दी उत्पादन से सफलता की नई इबारत लिख रही हैं।

प्रदेश सरकार द्वारा हल्दी की फसल के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करने से इन महिलाओं के हौसले और भी परवान चढ़े हैं।

वर्तमान में 35 रुपए प्रति किलो की दर से हल्दी बेच रही महिलाएं अब 90 रुपए समर्थन मूल्य घोषित होने पर आय में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी से गदगद हैं और इसके लिए प्रदेश सरकार का आभार भी जता रही हैं।

विकास खंड धर्मपुर के तनिहार गांव की कमलेश कुमारी इन्हीं मेहनतकश महिलाओं में से एक हैं। उनका परिवार पीढ़ियों से पारम्परिक खेती कर रहा था।

रबी और खरीफ की फसल पर मौसम की मार के अलावा जंगली जानवर फसलों को नुकसान पहुंचाते थे। इस कारण बीच में खेती करना छोड़ दी।

उन्होंने बताया कि एफपीओ धर्मपुर से जुड़ने के बाद तीन-चार खेतों में हल्दी की बिजाई शुरू की। बंदर और अन्य जानवरों से भी इसे नुकसान नहीं पहुंचता है।

उन्होंने बताया कि खंड विकास अधिकारी कार्यालय धर्मपुर से जानकारी मिलने पर गांव की महिलाओं ने जय बाबा कमलाहिया स्वयं सहायता समूह का गठन किया।

वर्तमान में इसमें छह महिलाएं काम कर रही हैं। सभी स्थानीय प्राकृतिक उत्पादों से आचार बनाती हैं। ग्राम स्तर पर दुकानों में जाकर इसकी बिक्री करते थे। कोई अच्छा ब्रांड न होने के कारण उतने दाम नहीं मिल पा रहे थे।

एफपीओ की मदद से एक साल पहले उनके उत्पादों को पहाड़ी रतन नाम से ब्रांड मिला और इसके विपणन में भी मदद मिली। इससे मुनाफा भी बढ़ा है।

महिलाएं स्वयं भी जैविक हल्दी का उपयोग करती हैं। इसके अलावा उन्होंने दुधारू पशु पाले हैं। इन सब कार्यों से हर महीने 15 से 18 हजार रुपए कमा लेती हैं।

कमलेश ने कहा कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने इस बार जो बजट पास किया, उसमें जैविक हल्दी का समर्थन मूल्य 90 रुपए प्रति किलोग्राम निर्धारित किया गया।

इसके लिए मुख्यमंत्री का तहेदिल से धन्यवाद करते हुए कहा कि इससे कृषक वर्ग को निश्चित तौर पर लाभ मिलेगा। जो किसान जंगली जानवरों के उत्पात के कारण खेती करना छोड़ चुके हैं, वे भी प्रदेश सरकार के किसान हितैषी निर्णयों से फिर से खेती की ओर रुख करेंगे।

स्वयं सहायता समूह श्री अन्न महिला प्रोसेसिंग सेंटर घरवासड़ा से जुड़ी सरोजनी देवी ने बताया कि वे दो सालों से जैविक हल्दी की खेती कर रही हैं। पहले मक्की, गेहूं और रागी की खेती करते थे।

बारिश या बंदरों की वजह से यह फसल अकसर खराब हो जाती और मेहनत का उतना लाभ नहीं मिलता था। वर्ष 2023 से एफपीओ धर्मपुर से जुड़ीं और उनके माध्यम से जैविक हल्दी परियोजना के बारे में जानकारी मिली।

सभी सदस्यों ने तीन से चार बीघा भूमि पर हल्दी की बिजाई कर दी, जिससे एक साल में अच्छी पैदावार हुई। पहले वर्ष एफपीओ ने हल्दी खेतों से ही 25 रुपए किलो के हिसाब से खरीदी, लेकिन अब हल्दी को साफ-सफाई करने के बाद 35 रुपए किलो की दर से बेच रहे हैं।

उन्होंने बताया कि समूह की सदस्य स्वयं ही कटाई, सुखाई, पिसाई और पैकिंग का कार्य करती हैं और घर का काम भी साथ में हो जाता है। इससे समूह को सालाना एक से डेढ़ लाख रुपए तक आमदनी हो जाती है।

आय बढ़ने से बच्चों की पढ़ाई व छिटपुट कार्यों के लिए परिवार की आर्थिक तौर पर भी मदद हो रही है। उन्होंने बताया कि गांव के अन्य किसान भी अपने खेतों में हल्दी की बुवाई कर रहे हैं जिससे घर-गांव में ही 20 से 25 क्विंटल जैविक हल्दी की पैदावार हो रही है।

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