मारकंडा नदी किनारे ढिमकी मंदिर के आंगन में समाधि में लीन हुए मस्तगिरी जी महाराज

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व्यूरो रिपोर्ट

हिमाचल प्रदेश के नाहन विकास खंड के अंतर्गत पवित्र मारकंडा नदी के किनारे ढिमकी मंदिर प्रांगण में बाबा मस्तगिरी जी महाराज समाधि में लीन हो गए। दोपहर के वक्त संत समाज ने बाबा को समाधि दी। इस दौरान आसपास के इलाके से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे।

समाधि से पूर्व बाबा की पवित्र देह को ‘ध्यान मुद्रा’ में दशनार्थ हेतु रखा गया। बाबा मस्तगिरी जी महाराज से सुभाशीष लेने न केवल हिमाचल बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते थे। प्राचीन ढिमकी मंदिर मारकंडा नदी के बीच में ही स्थित है। नदी के तांडव के बावजूद भी टस से मस नहीं होता है।

इलाके के अनुयायियों का कहना है कि बाबा को असीम शक्तियां प्राप्त थी। उफनती मारकंडा नदी को भी वो सहज पार कर लेते थे। बारिश के दौरान भी दिक्कत महसूस नहीं करते थे। क्षेत्र निवासी धनवीर ने कहा कि स्वयं ही बाबा को उफनती नदी पार करते देखा है।

समाधि स्थल पर जुटा संत समाज व अन्य।

उल्लेखनीय है कि बाबा मस्तगिरी जी महाराज की आयु 80-90 वर्ष के बीच थीे। वो इस पवित्र स्थान पर 30-40 वर्षों से रह रहे थे। ऐसा भी बताया गया कि असल संत जीवन में प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल खुद पर नहीं करता है, इससे ये शक्तियां संसार त्यागने से पहले ही क्षीर्ण हो जाती हैं। वो अपनी कमाई शक्तियों को साथ ही ले जाना चाहते हैं।

मंदिर का इतिहास़ ऋषि मार्केण्डेय से जुड़ा है। बाबा मस्तगिरी जी महाराज कुछ अरसे से प्राचीन शिवधाम पौड़ीवाला में रह रहे थे। कालाअंब-पांवटा साहिब-देहरादून हाईवे से गुजरते वक्त खजूरना पुल से मंदिर का भव्य नजारा नजर आता है। समाधि के दौरान बाबा पर श्रद्धालुुओं द्वारा फूलों की वर्षा लगातार की जाती रही।

बता दें कि एक बाबा द्वारा नाहन के शिमला मार्ग पर चबाहां में जीवित समाधि भी ली जाती थी। वैश्विक महामारी के दौरान नाहन के प्राचीन कालीस्थान मंदिर के महंत व राजगुरु पूज्य कृष्णानंद जी महाराज को 29 अप्रैल 2021 को मंदिर परिसर में ही समाधि दी गई थी।

वैश्विक महामारी की वजह से संत समाज व अनुयायियों ने समाधि के लिए सूक्ष्म व्यवस्था की थी। इससे पहले भी महंतों को यहीं समाधि दी जाती रही है।

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