माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला – जेबीटी अभ्यर्थियों को टीजीटी भर्ती एवं टीईटी परीक्षा में भाग लेने की अनुमति
शिमला – नितिश पठानियां
आज दिनांक 30 जून 2025 को हिमाचल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में एक नया अध्याय शुरू हुआ है। जब माननीय हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने जेबीटी (JBT) योग्यताधारी अभ्यर्थियों के पक्ष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति त्रिलोक सिंह चौहान एवं न्यायमूर्ति सुशील कुक्रेजा की माननीय खंडपीठ ने देव राज व अन्य बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य मामले में एक युगांतकारी आदेश पारित करते हुए जेबीटी योग्यताधारी अभ्यर्थियों को हिमाचल प्रदेश राज्य चयन आयोग, हमीरपुर द्वारा आयोजित होने वाली प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (TGT) भर्ती प्रक्रिया में अनंतिम रूप से भाग लेने की अनुमति प्रदान की है।
उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी इन अभ्यर्थियों को मोहित ठाकुर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य मामले में दिनांक 31 अक्टूबर 2023 के आदेश के माध्यम से टीजीटी (कला) के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) में भाग लेने की अनुमति प्रदान की गई थी।
इस ऐतिहासिक फैसले की पृष्ठभूमि में वर्षों से चली आ रही एक महत्वपूर्ण कानूनी बहस है जिसका केंद्रबिंदु राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के मानकों और हिमाचल प्रदेश सरकार के वर्तमान भर्ती नियमों के बीच असंगति का मसला था।
याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रस्तुत किए गए तर्कों के अनुसार, NCTE की स्पष्ट अधिसूचनाओं में यह निर्धारित किया गया है कि स्नातक डिग्री के साथ दो वर्षीय डिप्लोमा इन एलिमेंट्री एजुकेशन (D.El.Ed) धारक अभ्यर्थी भी कक्षा 6 से 8 तक के छात्रों को पढ़ाने की पूर्ण योग्यता रखते हैं।
इस आधार पर याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष यह मुद्दा उठाया था कि राज्य सरकार के वर्तमान भर्ती नियम राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं हैं और इसके कारण हजारों योग्य अभ्यर्थी अपने वैध अधिकारों से वंचित हो रहे हैं।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व भी मोहित ठाकुर बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य व अन्य मामले में माननीय मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव एवं न्यायमूर्ति श्रीमती ज्योत्स्ना रेवाल दुआ की खंडपीठ द्वारा दिनांक 31 अक्टूबर 2023 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया गया था जिसमें जेबीटी योग्यताधारी अभ्यर्थियों को टीजीटी (कला) के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) में भाग लेने की अनुमति प्रदान की गई थी।
न्यायालय की कार्यवाही के दौरान राज्य सरकार की ओर से उपस्थित अतिरिक्त महाधिवक्ता ने न्यायालय को अवगत कराया कि यदि याचिकाकर्ताओं को टीजीटी परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन जमा करने की अनुमति दी जाती है तो राज्य सरकार की ओर से इस पर कोई आपत्ति नहीं है।
राज्य सरकार के इस सहयोगात्मक रुख ने इस मामले में एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण किया और न्यायालय को एक संतुलित निर्णय लेने में सहायता प्रदान की।
इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि शिक्षा के क्षेत्र में योग्य मानव संसाधन का उपयोग राज्य की शैक्षिक प्रगति के लिए आवश्यक है।
इस महत्वपूर्ण मामले में याचिकाकर्ताओं का कानूनी प्रतिनिधित्व अधिवक्ता मोहित ठाकुर, अधिवक्ता कुनाल मेहता तथा अधिवक्ता हीना चौहान द्वारा किया गया है, जिन्होंने अत्यंत प्रभावी ढंग से अपने मुवक्किलों के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किए हैं।
इन वकीलों ने न्यायालय के समक्ष यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया कि NCTE के दिशा-निर्देशों के अनुसार जेबीटी योग्यताधारी अभ्यर्थी न केवल प्राथमिक स्तर पर बल्कि उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6-8) पर भी शिक्षण कार्य करने की पूर्ण क्षमता रखते हैं।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान भर्ती नियमों में इस संबंध में आवश्यक संशोधन किए जाने चाहिए ताकि राष्ट्रीय मानकों के साथ तालमेल बिठाया जा सके।
न्यायालय के इस निर्णय का व्यापक प्रभाव हिमाचल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर पड़ने की संभावना है। इस आदेश के परिणामस्वरूप हजारों जेबीटी योग्यताधारी अभ्यर्थी जो अब तक टीजीटी पदों के लिए आवेदन करने से वंचित थे, वे अब अपनी योग्यता के अनुरूप उच्च पदों के लिए आवेदन कर सकेंगे।
यह न केवल इन अभ्यर्थियों के लिए रोजगार के नए अवसर खोलेगा बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था को भी अधिक योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में सहायता मिलेगी।
इस संदर्भ में यह महत्वपूर्ण है कि न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया है कि यह भागीदारी अनंतिम प्रकृति की है और अंतिम न्यायालयीय निर्णय के अधीन है। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई 2025 को निर्धारित की गई है, जहां इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि अनंतिम भागीदारी से याचिकाकर्ताओं को कोई निहित या स्थायी अधिकार प्राप्त नहीं होता है और यह पूर्णतः न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन होगी।
इस निर्णय की व्यापक सामाजिक और शैक्षिक महत्ता को देखते हुए, यह कहा जा सकता है कि यह केवल एक कानूनी विजय नहीं है बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में न्याय और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल योग्य अभ्यर्थियों को उनके वैध अधिकार मिलेंगे बल्कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था में भी गुणात्मक सुधार आने की संभावना है।
यह निर्णय इस बात का भी प्रमाण है कि न्यायपालिका शिक्षा के मौलिक अधिकार और रोजगार के अवसरों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। इस संदर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष 2023 में पारित TET संबंधी आदेश ने इस दिशा में पहला कदम उठाया था और अब वर्तमान आदेश उसी श्रृंखला की अगली कड़ी है।
अंततः यह आदेश न केवल वर्तमान में लंबित मामले का समाधान करता है बल्कि भविष्य में इसी प्रकार के विवादों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक पूर्व उदाहरण भी स्थापित करता है।
यह निर्णय शिक्षा नीति निर्माताओं के लिए भी एक संदेश है कि राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप राज्य स्तरीय नीतियों का निर्माण करना आवश्यक है ताकि योग्य मानव संसाधन का बेहतर उपयोग हो सके।