नोटबंदी देश के साथ सबसे बड़ा धोखा – संदीप सांख्यान

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नोटबंदी ने देश को बेरोजगारी और मंहगाई की ओर धकेला, अगर नोटबंदी नहीं होती तो भारत की अर्थव्यवस्था विश्व के प्रथम पांच अर्थ व्यवस्था में होती – संदीप सांख्यान

हिमखबर डेस्क

प्रेस को जारी बयान में हमीरपुर संसदीय क्षेत्र के प्रवक्ता व पथ परिवहन निगम के भंडारण खरीब कमेटी के नामांकित सदस्य संदीप सांख्यान ने कहा कि आज के दिन साल 2016 में देश मे नोटबंदी करके देश की आमजनता के साथ केंद्र सरकार ने सबसे बड़ा धोखा किया था, यह एक अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति थी।

यदि यह नोटबंदी नहीं की होती तो देश की अर्थव्यवस्था आज विश्व की प्रथम पांच अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होती, साल 1991 की नई औद्योगिक नीति और देश मे चलाई गई पंचवर्षीय योजनाओं ने जो देश की बुनियाद रखी थी उसको नोटबंदी करके तहस-नहस कर दिया था।

उन्होने कहा कि नोटबंदी से पहले मुद्रा अर्थव्यवस्था में रक्तसंचार का काम करती वह “मनी-इन-सर्कुलेशन कहलाता था, जिससे देश में उद्योग लगते थे और रोजगार बढ़ता था, नोटबंदी ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया। तत्कालीन केंद्र सरकार का कहना था कि देश में मौजूद काले धन और नकली मुद्रा की समस्या को समाप्त करने के लिए यह कदम उठाया गया लेकिन न तो काला धन वापिस आया और देश में अफरातफरी अगल से मची।

आज के दिन साल 2016 को देश के माननीय प्रधानमंत्री जी ने राष्ट्रीय मीडिया पर अपने संबोधन में 500 रुपये और 1000 रुपये के नोट बंद करने की घोषणा कर दी, घोषणा इतनी घातक थी कि नोटबंदी उसी दिन आधी रात से लागू हो गई, इस एकाएक हुई घोषणा से उस समय बाजार में चल रही 86% करेंसी रद्दी कागज का टुकड़ा होकर रह गई, उनका कहना यह था कि देश में मौजूद काले धन और नकली मुद्रा की समस्या को समाप्त करने के लिए यह कदम उठाया गया।

बैंकों के बाहर लंबी-लंबी कतारें लगी रहीं और सैकड़ों लोंगो की जानें चली गई। एटीएम के सामने पैसे निकालने के लिए अविश्वसनीय रूप से लोगों की भीड़ लगी। बाद में 500 रुपये और 2000 रुपये के नये नोट जारी किए गए। संदीप सांख्यान ने कहा कि नोटबंदी के दुष्प्रभाव से न ही बेरोजगारी मिटी न ही मुद्रास्फीति कम हुई और न ही मंहगाई कम हुई।

हाँ इतना जरूर हुआ कि बेरोजगारी बढ़ी, नौकरियों से लोग निकाल दिए गए, देश की औद्योगिक गति रुक गई, देश का सकल घरेलू उत्पादन गिर गया, देश की आर्थिक स्थिति गंभीर हो गई। घरों में रखी गई छोटी-छोटी जमापूंजी बैंकों में जमा करके बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों को लोन के रूप में दे दी गई।

जिस पूँजी को तत्कालीन सरकार ने कालाधन कहा वह वास्तव में “मनी-इन-सर्कुलेशन” ही था। जिसके कारण देश के नागरिकों की जरुरतें पूरी होती थी। नोटबंदी के बाद 2000 हज़ार रुपये का नया नोट जारी किया गया, जिसके कारण कालेधन में और ज्यादा बढ़ौतरी हो गई, बीते सितंबर में वह भी बंद कर दिया। नोटबंदी में सबसे बड़ा झांसा कैशलेस अर्थव्यवस्था का दिया गया, जो संभव ही न हो सका।

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