
काँगड़ा- राजीव जस्वाल
देशभर में सनसनी बन चुकी फिल्म द कश्मीर फाइल्स देखकर हिमाचल में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों का दर्द एक बार भी छलक उठा है। फिल्म पर जब कश्मीरी पंडितों की प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो वे उस मंजर और फिल्म के दृश्यों को याद कर एकाएक भावुक हो उठे।
उन्होंने बताया कि फिल्म के हर दृश्य में सच्चाई को दिखाया गया है। ऐसा पहला प्रयास हुआ है, जब कश्मीर नरसंहार को काफी करीब से दिखाने की कोशिश हुई है। फिल्म देखने के बाद विस्थापित कश्मीरी पंडितों ने फिल्म के निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री के साहस की भी सराहना की है। पेश हैं जिला कांगड़ा में बसे विस्थापित कश्मीरी पंडितों से बातचीत के अंश।
कश्मीर जनसंहार का सच सामने आने में 30 साल लगना दुखद : राजन
कश्मीर से विस्थापित डॉ. राजन कोतरू ने बताया कि यह बात दुखद है कि कश्मीर घाटी में हुए नृशंस जनसंहार की सच्चाई सामने आने में 30 साल लग जाना दुखद है। द कश्मीर लाइन्स में फिल्म के निर्देशक डॉ. विवेक रंजन अग्निहोत्री ने कश्मीरी पंडितों की दर्द को दिखाने का एक ईमानदार प्रयास किया है। इसके बावजूद इस फिल्म से काफी कुछ ऐसा छूट गया है, जो उस समय दिल दहला देता था।
मेरे फूफा जी की सिर पर गोली मार कर दी थी हत्या : राका कौल
द कश्मीर फाइल्स फिल्म देखकर कश्मीर से विस्थापन के सारे जख्म हरे हो गए हैं। फिल्म में वह सब कुछ दिखाने की कोशिश की है, जो कि उस दौरान घटित हुआ था। यह बात कश्मीर नरसंहार के दौरान कांगड़ा पहुंची राका कौल ने कही।
उन्होंने बताया कि जब यह नरसंहार हुआ था, उस दौरान वह छोटी थी, लेकिन उनके जहन में आज भी उस नरसंहार की तस्वीरें जिंदा हैं। उन्होंने बताया कि करीब ढाई-तीन घंटे की फिल्म में वह सब कुछ दर्शाया गया है, जो उस समय वहां के लोगों के साथ घटित हुआ था।
फिल्म देखती बार हो गई थी इमोशनल : श्रेया बट्ट
मैं शनिवार को फिल्म देखने के लिए थियेटर में गई थी। फिल्म देखकर मैं काफी इमोशनल हो गई थी, जिसके चलते आज फिर फिल्म को देखने जा रही हूं। यह बात कश्मीर से विस्थापित होने का दंश झेल रही श्रेया बट्ट ने कही।
उन्होंने कहा कि उसका जन्म हिमाचल प्रदेश मेें ही हुआ है, लेकिन उसने अपने माता-पिता से इस विस्थापन के बारे में काफी सुना है। इस विस्थापन के बारे में जैसा उनके परिजन बताते थे, फिल्म में वैसा ही दर्शाया गया है।
माता-पिता की अंतिम इच्छा भी नहीं कर पाया पूरी: अशोक रैणा
कश्मीर नरसंहार के कारण हमें बहुत कुछ झेलना पड़ा है। मेरे माता-पिता की इच्छा थी कि उनका उस श्मशानघाट पर अंतिम संस्कार किया जाए, जहां पर उनके अन्य पूर्वजों का दाह संस्कार हुआ था। लेकिन मैं अपने माता-पिता की अंतिम
इच्छा भी पूरी नहीं कर पाया, क्योंकि वहां पर पहुंच पाना संभव नहीं है। यह बात कश्मीर नरसंहार के बाद कांगड़ा आए अशोक रैणा ने कही। उन्होंने मलाल जताते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि धारा-370 हटने के बाद वे वापस
कश्मीर जा सकेंगे, लेकिन आज तक ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया है।
