
शिमला – जसपाल ठाकुर
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर लेखकों के समक्ष चुनौतियों पर बेबाक चर्चा हुई। अपनी पीड़ा को झलकाते हुए ट्रांसजेंडरों ने अर्जुन के तीर से समाज में व्याप्त भेदभाव की ‘आंख’ को भेदा।
रामायण और महाभारत काल से लेकर वर्तमान में हो रही असमानताओं को उजागर करते हुए कई सवाल खड़े किए। मुख्य लेखकों पर उन्हें मुख्यधारा में शामिल नहीं होने देने का आरोप लगाया। बॉलीवुड पर भी कटाक्ष किए।
मराठी कवयित्री और स्तंभकार दिशा शेख ने त्रेतायुग में रामायण का उल्लेख करते हुए कहा कि जब श्रीराम 14 वर्ष के वनवास के लिए गए तो सभी गांव वाले उनके साथ चले गए थे। श्रीराम ने सभी नर और नारी को लौट जाने के आदेश दिए थे। हम वहीं खड़े रहे। रामायण लिखने वालों ने हम लोगों का उल्लेख नहीं किया।
द्वापर युग में महाभारत के दौरान जारी युद्ध का उदाहरण देते हुए दिशा शेख ने कहा शिखंडी को आगे रखकर अर्जुन ने भीष्म पितामाह पर तीर चलाया था। इससे अर्जुन हीरो बन गए। अगर लेखक चाहता तो यह तीर शिखंडी से भी चलवाया जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। लेखकों ने हमें कभी भी आगे नहीं आने दिया। हमें थर्ड जेंडर कहा जाता है। पहला और दूसरा जेंडर कौन है? यह भी आज पूछना जरूरी है।
सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका, दृश्य कलाकार और कवयित्री कल्कि सुब्रमण्यम ने कहा कि मुझे अपने शरीर पर एक किताब लिखने पर कई आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। किताब जगत, मैगजीन ने हमारे लिए कई चैक पोस्ट बनाए हैं। बॉलीवुड सहित अन्य फिल्मों में ट्रांसजेंडरों को गलत तरीके से पेश करते हुए शर्मिंदा किया जाता है।
हम समाज से अपना अधिकार चाहते हैं। किसी की दया के पात्र नहीं हैं। रेशमा प्रसाद ने ट्रांसजेंडरों को भी अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव में शामिल करने के लिए अकादमी का आभार जताया। भारत के पहले समलैंगिक कवि होशांग मर्चेंट की अध्यक्षता में यह सत्र चला।
लेखकों ने हमारे सत्र से भी किया किनारा : राव
सिम्बायोसिस इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी पुणे और नालंदा विश्वविद्यालय बिहार में विजटिंग प्रोफेसर आर राज राव ने कहा कि हम भी प्यार और परिवार चाहते हैं। हमने वीरवार को अन्य लेखकों के कई सत्र देखे, लेकिन हमारे सत्र से इन लेखकों ने किनारा कर लिया। हमारा साहित्य इन्हें ठीक नहीं लगता है।
ट्रांसजेंडरों की मदद को बनाया है संगठन : पायल
हिंदी, गुजराती और भीली भाषा की लेखिका पायल राठवा ने बताया कि उन्होंने ट्रांसजेंडर बच्चों की मदद के लिए गुजरात में एक संगठन बनाया है। जो मुश्किलें उन्हें पेश आईं, उनका सामना अन्य बच्चे न करें, इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने सरकारों पर मांगों को पूरा नहीं करने का आरोप भी लगाया।
देश के साहित्य में प्रकृति को विशेष स्थान मिला : यू. सुमति
बरखा बोलीं- नदी को इंसान ने बहा दिया, गांवों को शहर खा गया
भारतीय साहित्य का लंबा इतिहास रहा: डॉ. हरीश त्रिवेदी
