व्यूरो, रिपोर्ट
हल्के सर्दी, जुकाम, बुखार में भी जहां मरीजों के लिए अस्पताल और डाक्टरों से दवा और सलाह का प्रबंध होता है, वहीं जिस वैश्विक महामारी कोरोना से पूरी दुनिया दो साल से लड़ रही है उसके मरीजों के स्वास्थ्य को प्रदेश में आशा वर्कर के आसरे छोड़ दिया गया है। वो भी तब जब इस महामारी कीे दूसरी लहर जानलेवा बनकर आई है। बड़ी हैरत की बात है कि हेल्थ जो कि किसी भी इंसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है उसमें कोरोना जैसी जानलेवा बीमारी को आशा वर्कर मोनिटर कर रही हैं।
ग्रामीण क्षेत्र जोकि आज कोविड-19 से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं वहां बुजुर्ग और खासकर सिम्टोमेटिकली मरीजों के पास तड़पने के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। अपनी हिम्मत से अगर वो बच गए तो उनका सौभाग्य वरना उन्हें मौत के मुंह में जाने से कोई नहीं रोक सकता। पैरासिटामोट, आइवरमैक्टिन, डोक्सीसाइक्लिन जैसी बीमारियों को बंडल बनाकर जो मरीजों के पास कभी दूसरे, कभी तीसरे तो कभी चौथे दिन भी किसी जुगाड़ तंत्र के सहारे पहुंचाया जाता है वो दवाइयां कब तक खानी है, या कौन सी दवाई कब नहीं खानी है ये उन्हें वो आशा वर्कर बताती हैं जिनके पास किसी तरह की न तो मेडिकल ट्रेनिंग है न कोई ऐसा डिप्लोमा जिनके बूते वे कुछ बता सकें।
उन्हें कहा गया है कि वे दिन में दो बार मरीजों को हाल जानेंगी लेकिन वास्तव में ऐसा हो नहीं पा रहा। इसमें दिक्तत यह भी है कि दूर-दराज उनके पास आने-जाने का कोई साधन नहीं है। ऐसे भी वाकया सामने आए जहां मोबाइल फोन पर ही काम चलाया जा रहा है। केवल एक दिन फार्म पर दस्तख्त लेने के लिए जैसे-तैसे वे रोगी के घर तक पहुंच पाती हैं। जिन डाक्टरों को कहा गया था कि वे भी दूसरे या तीसरे दिन मरीज के स्वास्थ्य की एक्चुअल रिपोर्ट लेंगे वे असल में मरीजों तक पहुंच ही नहीं पाते।
मरीज के घर से यदि कोई व्यक्ति जैसे तैसे हिम्मत जुटाकर डाक्टर से संपर्क कर भी लेता है तो उससे व्हाटसऐप नंबर लेकर कहा जाता है कि रोज मरीज का टैपरेचर और ऑक्सीजन लेवल सेंड करते रहें। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जिनके पास ऑक्सीमीटर तो दूर थर्मामीटर भी नहीं है। अगर थर्मामीटर हैं भी तो कइयों को चैक करने का पता नहीं है।
ऑक्सीमीटर के हाल तो ऐसे हैं कि एक पीएचसी के तहत आने वाले मरीजों के लिए एक या दो हैं भी तो वे दूसरे मरीजों तक पहुंच ही नहीं पा रहे। कई बार तीसरे-चौथे दिन जैसे-तैसे पहुंच भी जाए तो दोबारा नहीं मिल पाता जबकि आज के दौर में सबसे ज्यादा मौतों का कारण है ऑक्सीजन लेवल का कम होना रह रहा है जिसके बारे में ग्रामीणों को ज्यादा जानकारी है नहीं।
किट में थर्मामीटर, ऑक्सीमीटर और स्टिमर भी हों
स्वास्थ्य महकमे को चाहिए कि जब भी कोई मरीज पोजीटिव आता है तो शहरों की तर्ज पर ग्रामीण मरीजों के लिए भी वहीं मेडिकल किट दे दी जाए ताकि जिस 102 या 103 डिग्री बुखार और अन्य पिड़ाओं को वो झेल रहा है उसका उसी समय से उपचार शुरू हो। इसके अलावा उस किट में एक थर्मामीटर, ऑक्सीमीटर और स्टिमर की भी व्यवस्था होनी चाहिए साथ ही पोजीटिव हुए मरीज के साथ आए व्यक्ति को उसके इस्तेमाल का तरीका भी बताया जाना चाहिए।
डाक्टर से परामर्श बेहद जरूरी : प्रो. सुनील रैणा
कोविड-19 पर काफी रिसर्च कर चुके ब्रटेन सहित कई अन्य देशों को एडवाइज कर चुके कांगड़ा स्थित टांडा मेडिकल कालेज के कम्युनिटी डिपार्टमेंट के हैड प्रो. सुनील रैणा की मानें तो इस बीमारी में डाक्टर का परामर्श सबसे महत्वपूर्ण है।
डाक्टर सभी मरीजों तक फिजिकली नहीं पहुंच सकते लेकिन जहां भी कोरोना मरीज हैं उस परिवार के पास उनका मोबाइल नंबर होना चाहिए ताकि जब भी उन्हें लगता है कि स्थिति सामान्य नहीं है तो वे उनसे बात कर सकें।
वहीं डाक्टर का व्यवहार भी फ्रेंडली होना जरूरी है अन्यथा ऐसा न हो कि तीमारदार या मरीज डाक्टर को बात करते वक्त डरे और पूरी बात कह ही न सके।