
कार्मिक विभाग ने कहा; दूसरे जिले में रेगुलर करने का फैसला गलत, और उलझेगा केस
शिमला- जसपाल ठाकुर
कांट्रेक्ट अवधि में एक जिला से दूसरे जिला में ट्रांसफर हुए टीचर फंस गए हैं। शिक्षा विभाग की इंटर डिस्ट्रिक्ट ट्रांसफर पॉलिसी का मसला सुलझने की जगह और उलझने वाला है। दरअसल, शिक्षा विभाग ने यह केस अब कार्मिक विभाग को भेजा है। कार्मिक विभाग इन फाइल को डील कर रहा है और अपनी राय शिक्षा विभाग को भेजने वाला है। लेकिन यह राय शिक्षा विभाग की पॉलिसी और भेजे गए प्रस्ताव के खिलाफ है।
दरअसल, शिक्षा विभाग ने कार्मिक विभाग से पूछा था कि अनुबंध पर ही अंतर जिला पालिसी के कारण नए जिला में ज्वाइन करने वाले शिक्षक क्या उन जिलों में रेगुलर किए जा सकते हैं, जहां के उपनिदेशक ने अब तक यह रेगुलराइजेशन नहीं की है। वर्तमान में 12 में से सात जिलों में ये नियमितिकरण हो चुका है और पांच में होना बाकी है।
सबसे पहले बिलासपुर के उपनिदेशक ने 2016 की कार्मिक विभाग की चिट्ठी का हवाला देते हुए यह मामला प्रारंभिक निदेशालय से उठाया था। इसके बाद देखा-देखी में अन्य जिलों ने भी ऐसा ही किया। अब स्थिति यह है कि एक जिला से दूसरे जिला में मुचुअल आधार पर ट्रांसफर हुए दो शिक्षकों में से एक रेगुलर हो गया है और दूसरा नहीं हुआ है।
ये ट्रांसफर शिक्षा विभाग की अपनी ट्रांसफर पॉलिसी के कारण हो पाई, जिसे वर्तमान सरकार ने जेबीटी और सीएंडवी के जिला कैडर को राहत देने के लिए बनाया था। लेकिन अब जब विवाद हुआ, तो मामला कार्मिक विभाग को भेजा गया।
कार्मिक विभाग का तर्क है कि अनुबंध पर 2016 के निर्देशों में साफ है कि कांट्रेक्ट पीरियड में नए नियोक्ता के पास ज्वाइनिंग से अनुबंध अवधि नए सिरे से पूरी करनी होगी, लेकिन शिक्षा विभाग ने अपनी अलग पॉलिसी कैबिनेट से अप्रूव करवाकर कैबिनेट के अधिकारों में इनफ्रिजमेंट की है।
इसलिए रेगुलर नियुक्ति देने वाले उपनिदेशकों के खिलाफ कार्रवाई का आधार बनता है। दूसरा तर्क यह दिया गया है कि इंटर डिस्ट्रिक्ट पॉलिसी में यह लिखा ही नहीं गया है कि ये अनुबंध के लिए है या नहीं? तीसरा सवाल यह भी है कि जब सात जिलों में नियुक्ति दे दी गई, तो सिर्फ पांच जिलों के मामले को क्यों भेजा गया। हालांकि यह तथ्य फाइल पर रिकार्ड कर अभी तक शिक्षा विभाग को वापस नहीं मिले हैं, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा।
शिक्षा विभाग की गलती की सजा भुगत रहे हैं शिक्षक
इंटर डिस्ट्रिक्ट ट्रांसफर पॉलिसी में शिक्षक विभाग की गलती की सजा भुगत रहे हैं। पहले जब यह पॉलिसी बनाई गई तो कार्मिक विभाग से पूछे बिना सीधे कैबिनेट से ही अप्रूवल ली गई। अब जबकि अपने ही विभाग के उपनिदेशकों ने मसले को उलझा दिया, तो कार्मिक विभाग से पूछा जा रहा है। ऐसे में अनुबंध से रेगुलर हुए और रह गए शिक्षकों का भविष्य लटक गया है।
कैबिनेट में पर्ची के जरिए डिस्कस हुआ था केस
यही मामला पिछले महीने हुई कैबिनेट की बैठक में एक पर्ची के जरिए डिस्कस हुआ था। यानी इसे एजेंडे पर लेने की जगह एक पर्ची पर मूव किया गया और इस पर चर्चा भी की गई। लेकिन सूत्र बताते हैं कि कुछ मंत्रियों ने इसे पूरी कंसल्टेशन के साथ एजेंडे पर लाने को कहा। वहां कार्मिक विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने भी बिना विभाग को बताए केस लाने का विरोध किया था।
