अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा समय के साथ कई बदलावों का साक्षी रहा है, बुजुर्गों ने पुराने मेले की यादें साझा करते हुए बताया कि पहले दशहरा कैसे मनाया जाता था और समय के साथ इसकी परंपराओं में क्या बदलाव आए हैं, ढालपुर मैदान में कभी घरों से राशन और बिस्तर लेकर आते थे देव समाज के लोग, अब पारंपरिक नाटी की जगह ले रहे आधुनिक कार्यक्रम।
हिमखबर डेस्क
ऐतिहासिक ढालपुर मैदान में आयोजित होने वाला कुल्लू दशहरा उत्सव आज अंतरराष्ट्रीय पहचान बना चुका है। हालांकि, इस मुकाम तक पहुंचने के सफर में उत्सव ने कई बदलाव और उतार-चढ़ाव देखे हैं। समय के साथ सुविधाएं बढ़ीं, देवी-देवताओं की भागीदारी में विस्तार हुआ और देश-विदेश से आने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ी। लेकिन इन बदलावों के बीच देव संस्कृति और पारंपरिक रीति-रिवाजों को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।
कुल्लू दशहरा उत्सव में पहुंचे 70 से 85 वर्ष तक के बुजुर्गों का कहना है कि समय के साथ कई अच्छे बदलाव हुए हैं। सरकार की ओर से देव समाज को सुविधाएं मिलना सकारात्मक पहल है, लेकिन उत्सव की मूल संस्कृति और परंपराओं को भी संरक्षित रखने की जरूरत है।
कभी घरों से राशन और बिस्तर लेकर आते थे देव समाज के लोग
बुजुर्गों के अनुसार, एक समय ऐसा था जब देव संस्कृति के निर्वहन के लिए देव समाज के लोग अपने घरों से राशन और सोने के लिए बिस्तर लेकर दशहरा उत्सव में पहुंचते थे। उस दौर में खुले आसमान के नीचे रहकर देव परंपराओं का निर्वहन किया जाता था। देवी-देवताओं की भागीदारी और लोगों की भीड़ भी अपेक्षाकृत कम रहती थी।
समय के साथ सरकारी सहायता और सुविधाएं बढ़ीं। इससे देवी-देवताओं की भागीदारी में भी विस्तार हुआ। बुजुर्ग इसे देव संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में सकारात्मक कदम मानते हैं। हालांकि, उनका कहना है कि बदलते पहनावे, व्यवहार और उत्सव के आयोजन के तरीकों का असर पारंपरिक संस्कारों पर भी दिखाई देने लगा है।
देव परंपराओं में कम हो रहे संस्कार, ध्यान देने की जरूरत
बंजार के 85 वर्षीय सत्य देव नेगी का कहना है कि पहले लोग देवता के पास जाते समय टोपी पहनने जैसे पारंपरिक संस्कारों का विशेष ध्यान रखते थे। अब ऐसे रीति-रिवाजों का पालन पहले की तुलना में कम होता दिखाई दे रहा है।
उन्होंने कहा कि देव समाज के लोगों को सुविधाएं मिलना अच्छी बात है, लेकिन देव संस्कृति से जुड़े संस्कारों को बनाए रखने के लिए भी गंभीरता से प्रयास करने की जरूरत है।
पहले देव संस्कृति से जुड़ाव के लिए आते थे लोग
सैंज घाटी के लीलाधर, जिनकी उम्र 70 वर्ष है, बताते हैं कि जब वह करीब 20 वर्ष के थे, तब पहली बार दशहरा उत्सव में पहुंचे थे। उस समय और आज के उत्सव में काफी अंतर आ चुका है।
उनके अनुसार, पहले सुविधाएं सीमित थीं और लोग मुख्य रूप से देव संस्कृति से जुड़ाव के कारण उत्सव में भाग लेने आते थे। इस वजह से भीड़ भी कम रहती थी। अब सुविधाओं में वृद्धि होने से उत्सव में आने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है।
रातभर गूंजती थी पारंपरिक नाटी, अब बदला स्वरूप
डोभी के खीम दास बताते हैं कि उन्हें दशहरा उत्सव देखते हुए 50 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। पहले रथयात्रा और जलेब जैसी देव परंपराएं उत्सव का प्रमुख हिस्सा हुआ करती थीं। देव शिविरों के बाहर लोग रातभर पारंपरिक नाटी लगाते थे, जिससे उत्सव का सांस्कृतिक माहौल जीवंत बना रहता था।
उन्होंने कहा कि अब पारंपरिक नाटी का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है और उसकी जगह आधुनिक कार्यक्रमों ने ले ली है। ऐसे में पारंपरिक लोक संस्कृति को बचाए रखने की आवश्यकता है।
‘भीड़ का उत्सव बनता जा रहा दशहरा’
जिभी के तेजा सिंह का कहना है कि कुल्लू दशहरा धीरे-धीरे भीड़ का उत्सव बनता जा रहा है। पहले यह पारंपरिक संस्कृति और देव रिवाजों के निर्वहन का प्रमुख केंद्र हुआ करता था, लेकिन समय के साथ पारंपरिक संस्कृति में कमी महसूस की जा रही है।
उन्होंने कहा कि पहले देव समाज के लोगों को खाने-पीने का सामान और सोने के लिए बिस्तर भी अपने घरों से लाने पड़ते थे। अब सरकारी सुविधाएं बढ़ने से उनके लिए व्यवस्थाएं बेहतर हुई हैं।
सुविधाओं के साथ मूल संस्कृति को बचाना जरूरी
सीस के चुन्नी लाल का कहना है कि सरकारी सहयोग से देव समाज के लोगों को बेहतर सुविधाएं मिलना सुखद है। इससे उत्सव में भागीदारी और व्यवस्थाओं को मजबूती मिली है। हालांकि, इसके साथ ही कुल्लू दशहरा की मूल संस्कृति और परंपराओं को प्रभावित होने से बचाने पर भी समय रहते ध्यान देना जरूरी है।
बुजुर्गों के अनुभव इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कुल्लू दशहरा की अंतरराष्ट्रीय पहचान और आधुनिक व्यवस्थाओं के साथ उसकी पारंपरिक विरासत का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। देव परंपराएं, पारंपरिक नाटी, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक संस्कार ही इस उत्सव की विशिष्ट पहचान हैं। इन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने का आधार होगा।

