
परागपुर-आशीष कुमार
हेरिटेज विलेज प्रागपुर एक धरोहर:- यह ऐतिहासिक गांव हिमाचल प्रदेश के कागड़ा जिला के देहरा तहसील के अंतर्गत आता है। ये लगभग चंडीगढ़ से 185 किलोमीटर दूरी पर स्थित है ओर देहरा तहसील से 13 किलोमीटर दूरी पर स्थित है। यह ज्वालामुखी (21 किमी) और चिंतपूर्णी मंदिरों (20 किमी) के दर्शन के लिए उत्कृष्ट आधार है।
कांगड़ा हवाई अड्डे से 56 किलोमीटर – गग्गल और आदमपुर हवाई अड्डे (जालंधर) से 84 किलोमीटर दूर स्थित है।
9 दिसंबर 1997 की एक अधिसूचना द्वारा राज्य सरकार ने प्रागपुर को “विरासत क्षेत्र” के रूप में वर्गीकृत किया है ।।
परागपुर की स्थापना
कहा जाता है इसकी स्थापना १६वीं सदी के अंत या १७वीं सदी की शुरुआत में जसवां साम्राज्य की राजकुमारी प्राग देई के सम्मान में की गई थी, जिनके शासक कांगड़ा राज्य के कटोच वंश के कैडेट थे। यह एक ऐसा समय था जब पहाड़ियों पर लुटेरा सेनाओं का नियमित हमला होता था और राजकुमारी ने उनका सफलतापूर्वक विरोध किया था।
प्राग का अर्थ संस्कृत में “पराग” है और पूर का अर्थ है “पूर्ण”, इस लिए प्रागपुर का मतलब है “पराग से भरा”, जो वसंत में खिलने के साथ क्षेत्र में सही ढंग से वर्णन करता है। प्रागपुर के साथ, गरली के पास के गांव हेरिटेज जोन का हिस्सा है।
परागपुर के हाट बाजार को इस तरह से बनाया गया है कि बरसात का पानी सीधा नालों के माध्यम से बाजार से बाहर पहुँच जाता है। पुराने समय मे यहां राहगीरों के लिये अटियाले भी बनाये गए थे जिनका निशान आज भी यहां देखा जा सकता है ।
धरोहर गांव के धार्मिक स्थल —
गांव में प्राचीन समय के तीन मन्दिर गांव बिराजमान है ।। एक राधा कृष्ण मंदिर बाजार में ।। दूसरा बाजार के थोड़ा और मध्य में ओर एक बुटेल मन्दिर है ये मंदिर कम से कम 1868 के समय के बताए जाते है ।। बर्तमान समय है सिर्फ दो मन्दिर ही प्राचीन सितिथि में है ।
बाजार का मुख्य केंद्र तालाब —
तालाब के इतिहास के बारे का बिजय लाल बताते है कि यह तालाब जो है 1868 में बनाया गया। जहां तक कि जानकरी मिलती है इस विषय मे उन्होंने बहुत ही रोचक कहानी बताई। उन्होंने बताया कि पुराने समय मे जब राजाओं का राज था तो जब बो राजा गांव में आते थे तो बो गांव के लोगो को यज्ञ अनुष्ठान करने के बादभोज दिया करते थे ।
जिसके लिये पानी की व्यवस्था पास के ही गांव नलेटी से की जाती थी। परन्तु एक समय यज्ञ के बाद भोज के समय पानी की व्यवस्था समय पर नही की जा सकी। तब उस समय बाजार में तालाब का निर्माण किया गया था। बाद में पीने के पानी के लिये बाजार में एक नोण का निर्माण करवाया। जिसके लिये पाइप पंजाब गुजरात और इंग्लैड से मंगवाए गए। आज भी उनमें से ज्यादा पाइप नहर समिति के पास सुरक्षित है ।
परागपुर का आकर्षण —
परागपुर में घुमावदार गलियां स्लेटपॉश मकान ओर बाजार के बीचोबीच बना तालाब इसके आकषर्ण का केंद्र है। साथ मे बुटेल समुदाय की सो दो सौ वर्ष बनी हवेलियां इसका मुख्य केंद्र है। जज साहब की कोठी प्रसिद्ध है।
परागपुर की शान जज साहब को कोठी वर्तमान में होटल
प्रागपुर के मध्यकालीन गांव के केंद्र में एक साढ़े तीन सौ साल पुरानी पैतृक हवेली है जिसे जज के दरबार के रूप में जाना जाता है। यह मुख्य कांगड़ा घाटी से लगभग 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
यह देश के प्रमुख स्थलों में से एक है जहां ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसे शुरू में जस्टिस सर जय लाल के लिए उनके प्यारे पिता भंडारी लाल ने बनवाया था। न्यायाधीशों के न्यायालय की स्थापना के पीछे एक बहुत ही रोचक इतिहास है।
भंडारी राम कुठियाला, जिनके पास विभिन्न दुकानों और गाँव में एक विशाल भूमि थी, ने अपने बेटे जय लाल को शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा। लड़के को नाइट की उपाधि दी गई और जल्द ही वह उत्तर भारतीय न्यायपालिका में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गया।
सर जय लाल ब्रिटीश काल मे दूसरे भारतीय जज बने थे उस समय
उनके पोते श्री बिजय लाल जी बताते है कि आजादी से पहले लाला लाजपतराय का केस सर जय लाल के कोर्ट में आया था तो उस समय के पंजाब प्रांत के गवर्नर ने लाला जी को कड़ी सजा देने के लिये दबाब बनाया था परंतु उन्होंने लाला लाजपतराय को बरी कर दिया था ।
1914 – 1918 में, भंडारी राम ने अपने बेटे के लिए एक बड़ी जागीर बनाई। दुर्भाग्य से, घर का उपयोग शायद ही कभी किया जाता था। सर जय लाल के पोते विजय लाल ने अपनी जड़ों की ओर लौटने और हवेली का जीर्णोद्धार करने का फैसला किया।
आज जज कोर्ट को भारत के सबसे अच्छे और शानदार कंट्री होटलों में से एक माना जाता है
जज कोर्ट जो कि अब होटल में तब्दील हुआ है। यहां रहने वाले बताते है कि होटल में रहना अग्रेजो ओर राजाओं के काल का स्मरण करवाता है।
एक विशाल शानदार कंट्री मैनर (विशेष रूप से इंडो-यूरोपीय परंपरा में डिज़ाइन किया गया) 3 सूट सहित लगभग 10 डबल कमरों का सुरुचिपूर्ण आवास प्रदान करता है।
