
दुराना- राजेश कुमार
हिमाचल में आगामी चुनावों को लेकर अगर गहनता से अध्ययन किया जाए तो आगामी चुनावों से पूर्व जब भी भाजपा एवं कांग्रेस पार्टी के बीच भीतरघात या बगावत होती थी तो एक दल से बगावत एवं भीतरघात का फायदा दुसरे दल को सीधे सीधे मिलता था लेकिन इस बार स्थिति साफ साफ अलग दिखाई देने लगी है।
इस बार अब तक के राजनीति घटनाक्रम को देखा जाए तो कांग्रेस एवं भाजपा के बीच भीतरघात एवं बगावत का अधिकतर फायदा आम आदमी पार्टी को होने लगा है जिस कारण से भाजपा और कांग्रेस पार्टी के मुख्य कैडर को चिंता सताने लगी है।
इसके उदाहरण दिल्ली और पंजाब के चुनावों में देखने को मिल भी चुके हैं। कांग्रेस और भाजपा में मुख्यमंत्री चहेरे और टिकटों के मिलने कटने को लेकर असमंजस सा माहौल बना हुआ है जबकि आम आदमी पार्टी का कुनबा बिना मुख्यमंत्री चहेरे एवं बिना उम्मीदवारों की घोषणा के भी बढ़ने लगा है।
मंडी में केजरीवाल की रैली और कांगड़ा में होने जा रही केजरीवाल की रैली का आयोजन बिना मुख्यमंत्री एवं उम्मीदवारों के चहेरों के होना भी इस बात का सबूत है कि भाजपा और कांग्रेस से बगावती लोग ही इन रैलियों का आयोजन करने में सफल हो रहे हैं जबकि भाजपा और कांग्रेस को ऐसी रैलियों करने में बड़े बड़े धुरंधरों को ऐड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है।
