
बैजनाथ- बर्फू
ऐतिहासिक शिव मंदिर बैजनाथ में सवा चार क्विंटल देसी घी और सूखे मेवों से घृत मंडल शुक्रवार देर शाम को तैयार कर लिया गया। मकर संक्रांति पर पवित्र शिवलिंग पर जलाभिषेक के बाद मंदिर पुजारी उमाशंकर की देखरेख में घृत मंडल तैयार करने का कार्य शुरू हुआ। करीब चार फीट ऊंचा देसी घी व सूखे मेवों से बनाए गया घृत मंडल आगामी सात दिन तक इसी प्रकार पवित्र शिवलिंग पर चढ़ा रहेगा। 21 जनवरी को सुबह नौ बजे के बाद से श्रद्धालुओं में इसको प्रसाद के रूप में वितरित कर दिया जाएगा।
मंदिर पुजारी सुरेंद्र आचार्य बाद धर्मेंद्र शर्मा के अनुसार 108 मर्तबा ठंडे पानी से धोने और सूखे मेवों से सात दिन तक पवित्र शिवलिंग पर सुसज्जित रहने के कारण यह घी औषधि का रूप धारण कर लेता है। चर्म रोगों के उपचार में सहायक रहता है। शुक्रवार सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।
घृत मंडल को पुजारी उमाशंकर, सुरेंद्र, आचार्य धर्मेंद्र शर्मा, संजय शर्मा, शांति स्वरूप के अतिरिक्त मंदिर ट्रस्टी गुरबचन चौहान, अनिल शर्मा और अनिल अवस्थी तथा मंदिर का कार्यभार देख रहे विजय कटोच ने तैयार करने में सहयोग किया। इस मर्तबा मौसम अनुकूल रहने पर देर शाम छह बजे ही घृत मंडल को तैयार कर लिया गया, जबकि पूर्व के वर्षों में अनेक मर्तबा रात को 10 से 11 के बीच में घृत मंडल को तैयार किया जाता रहा है।
घृत मंडल को तैयार करने में कोरोना नियमों की पूरी तरह से पलना की गई और पुजारियों के करोना टेस्ट कर जांच की गई। मंदिर ट्रस्टी अनिल शर्मा ने बताया कि 21 जनवरी को सुबह नौ बजे के बाद प्रसाद का वितरण मंदिर परिसर में किया जाएगा। इसके अतिरिक्त उपमंडल के अन्य मंदिरों में भी घृत मंडल तैयार किया गया है।
घृतमंडल बनाकर शिवलिंग पर लेप
उनका यह भी कहना है कि मान्यता यह भी है कि जालंधर दैत्य द्वारा युद्ध के दौरान समस्त देवी-देवताओं को जख्म हो गए, उन जख्मों पर मरहम लगाने के लिए लेप किया जाता है। इसी उद्देश्य से यह घृतमंडल बनाकर शिवलिंग पर लेप लगाने की परंपरा चली आ रही है ।
सात दिन विश्राम करते आते हैं भोलेनाथ
यही नहीं, कैलाश पर्वत पर कड़ाके की ठंड पडऩे पर भोलेनाथ सात दिनों तक इसी मंदिर में मां पार्वती सहित विश्राम करने आ जाते हैं।
घृत चरम रोगों के लिए अचूक औषधि
चिकित्सकों की मानें, तो सात दिन तक पवित्र शिवलिंग पर मक्खन का लेप होने से व 108 बार ठंडे पानी से धोने पर, यह घी व मेवों के साथ रहने के कारण औषधि का रूप धारण कर लेता है। इस मक्खन रूपी प्रसाद को खाया नहीं जाता। यह घृत चरम रोगों के लिए भी अचूक औषधि के रूप में प्रयोग की जाती है।
