विचारणीय : हिमाचल प्रदेश में फिर कुदरत का कहर, क्यों नहीं लिया 2023 से सबक

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हिमखबर – नितिश पठानियां 

हिमाचल प्रदेश में 2023 की विनाशकारी आपदा से सबक न लेने का नतीजा अब फिर से सामने आ रहा है। गुरुवार सुबह राज्य ने कुदरत का एक और रौद्र रूप देखा, जब कई जिलों में भारी बारिश और भूस्खलन से तबाही मच गई।

पहाड़ों का अवैज्ञानिक खुदान, अवैध खनन और पेड़ों की कटाई पर सख्त नीतियों की कमी ने इन समस्याओं को नियमित कर दिया है।

2023 की आपदा में, 14 अगस्त को महज एक दिन में 57 लोगों की जान चली गई थी, जबकि कुल 512 मौतों का आंकड़ा सामने आया था। राज्य सरकार ने 12,000 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया था, जबकि केंद्रीय टीम ने 9,000 करोड़ रुपये के नुकसान की सहमति जताई थी।

पिछले वर्ष भी अगस्त महीने में ही इस तबाही का सामना करना पड़ा था। 2024 में, अगस्त का महीना शुरू होते ही शिमला, कुल्लू और मंडी जिलों से आपदा के घाव मिलने शुरू हो गए हैं।

शुक्र इस बात है कि इस बार, मानसून की रफ्तार धीमी है, अन्यथा नुकसान का आंकड़ा बढ सकता था। चंद घंटों की मूसलाधार बारिश ने ही तबाही मचा दी है। पूरे प्रदेश में पहाड़ों को खोदकर बहुमंजिला इमारत बनाने का क्रम जारी है।

उदाहरण के तौर पर, सोलन में 5 से 10 किलोमीटर की परिधि में पहाड़ खोदकर भवन बनाए जा रहे हैं। भले ही ये भवन निजी जमीनों पर बनाए जा रहे हैं, लेकिन पहाड़ों की खुदाई को लेकर सख्त नियम न होने से हर बार ऐसी आपदा का सामना करना पड़ेगा।

बड़ा सवाल यह भी है कि महज एक-दो घंटे की बारिश में ही क्यों नदियां उफान पर आ जाती हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि पुराने नालों और खड्डों को संकीर्ण कर दिया गया है, जिससे ये तेज बहाव में पानी की तीव्रता को नहीं झेल पाते हैं।

सवाल यह भी उठता है कि खतरनाक जगहों पर कौन नक्शे पास करता है, जबकि सब कुछ सामने दिख रहा होता है। प्रदेश में 2023 की आपदा के बाद भी निर्माण में कोई कमी नहीं आई है और न ही नदियों-नालों के किनारे निर्माण रुका है।

उधर, मैदानी इलाकों में नदियों और नालों से बड़े स्तर पर अवैध खनन भी भविष्य के लिए खतरे की घंटी बजा रहा है। गुरुवार को बादल फटने की घटना में चार लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी थी, और 52 लोगों के लापता होने की सूचना है।

समय बीतने के साथ लापता लोगों के सुरक्षित बचने की उम्मीद भी कम होती जा रही है। गनीमत यह है कि पर्यटकों का फ्लो कम था, अन्यथा जान-माल का नुकसान और भी बढ़ सकता था।

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