यहां हर साल लगता है आशिकों का मेला, मोहब्बत की याद में होता है भजन-कीर्तन

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हिमखबर डेस्क

मेले तो बहुत होते हैं, जैसे कि धार्मिक, पारंपरिक, व्यापारिक आदि, लेकिन कभी आपने यह सुना है कि आशिकों का मेला हो, नहीं तो आज हम आपको एक ऐसे मेले के बारे में बताएंगे, जो न धर्म से संबंध रखता है और न परंपराओं तथा व्यापार से। यह मेला है नाकाम मोहब्बत का, जिसे आशिकों का मेला कहा जाता है।

आशिकों का यह मेला उत्तर प्रदेश के बांदा में लगता है और बाकायदा इस मेले का एक मंदिर भी है। जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश के बांदा में केन नदी के तट पर स्थित नट महाबली मंदिर में मकर संक्रांति के अवसर पर ऐतिहासिक दो दिवसीय आशिकों का मेला मंगलवार से शुरु हुआ है।

मान्यता के अनुसार यह ऐतिहासिक मेला प्रतिवर्ष मकर संक्रांति में दो दिन तक अपने प्राणों की आहुति देने वाले प्रेमी-प्रेमिकाओं की याद में मनाया जाता है, जहां स्थापित दो मंदिर में प्रेम-प्रेमिकाओं द्वारा भजन, पूजन के बाद प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगी जाती है।

क्या है मेले का इतिहास

लोक मान्यता के अनुसार 600 वर्ष पूर्व महोबा के राजा अर्जुन सिंह भूरागढ़ किले के किलेदार थे। इस दुर्ग में मध्य प्रदेश के सरबई निवासी वीरन (21) नौकरी करता था, जो नाचने-गाने व शारीरिक कला का प्रदर्शन करने वाले नट समुदाय से संबंधित था। किले में नौकरी के मध्य राजा की बेटी को वीरन और वीरन को उससे से प्यार हो गया था। दोनों एक दूसरे से शादी करना चाहते थे।

राजा ने रख दी थी शर्त

दोनों की इस प्रेम कहानी का पता राजा अर्जुन को चला तब किलेदार अर्जुन ने विवाह के लिए वीरन के आगे शर्त रखी कि अगर वह एक कच्ची रस्सी के सहारे पूरी केन नदी चलकर पार कर जाएगा, तो वह अपनी पुत्री का विवाह उससे करेगा। प्रेम के धागे में बंधे नट ने यह शर्त मान ली। तब एक कच्ची रस्सी नदी के इस पार से उस पार तक किले में बांधी गई।

जिसमें नट वीरन चलता ने चलना शुरू किया जिसे राजा और उसकी पुत्री लगातार देख रहे थे और नट वीरन जब नदी पार करने के बिल्कुल नजदीक था। तभी राजा अर्जुन ने रस्सी काट दी, जिससे नट वीरन की केन नदी की चट्टानों में गिरकर मृत्यु हो गई।

प्रेमिका ने भी त्याग दिए प्राण

नट वीरन की मौत देख उसकी प्रेमिका राजा की बेटी ने भी किले से चलांग लगा दी और उसकी भी मृत्यु चट्टानों में गिरकर ही उसी समय हुई। तब से यहां प्रेमी प्रेमिकाओं की याद में दो मंदिर स्थापित कर मकर संक्रांति के अवसर पर मेला आयोजित किया जाने लगा।

प्रतिवर्ष इस नटबली मंदिरों में सैकड़ो प्रेमी-प्रेमिका पूजन, अर्चना के बाद प्रसाद चढ़ा कर मन्नत मांगते हैं और हजारों की संख्या की भीड़ मेले में दिनभर मौजूद रहती है। मकर संक्रांति पर भारी संख्या में श्रद्धालु केन नदी में स्नान करते हैं। जिला प्रशासन द्वारा सुरक्षा आदि के विशेष प्रबंध किए जाते हैं।

इतिहासकार नहीं मानते प्रेम कहानी

इतिहासकार इस प्रेम कहानी को दरकिनार करते हैं। इतिहासकारों के अनुसार स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहां हजारों राष्ट्र भक्तों ने अपनी प्राण न्योछावर किए थे। इस स्वतंत्रता संग्राम में प्राणों की आहुति देने वालों में नट समुदाय की संख्या सैकड़ों में थी। इस स्थान पर अनेकों क्रांतिकारियों की समाधि और कब्र भी है।

नट समुदाय के राष्ट्रभक्त बलिदानियों और बहादुरों की याद में नटबली स्थल में मंदिर बनाकर पूजा अर्चना शुरू हुई थी, लेकिन कलयुग के प्रभाव के चलते राष्ट्रभक्तों का बलिदान प्रेम कहानी के आगे फीका दिखाई देता है।

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