नशे की लत ने जेल में कैदियों का इलाज करने वाले डॉक्टर को बना दिया अंडर ट्रायल “कैदी”

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हिमखबर डेस्क 

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जनपद मुख्यालय नाहन से सामने आए चर्चित चिट्टा मामले में अब चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं।

विडंबना देखिए,जो डॉक्टर शहर में जिस आदर्श केंद्रीय कारागार (Central Jail Nahan) में कैदियों के स्वास्थ्य की जांच करता था, आज वो वही अंडर ट्रायल कैदी बन गया है।

बता दे कि जांच में यह बात भी सामने आई है कि मरीजों का इलाज करने वाला डॉक्टर खुद भी नशे के जाल में फंसा हुआ था और कथित तौर पर पूरे नेटवर्क को संचालित करने में भी भूमिका निभा रहा था।

जानकारी के मुताबिक आरोपी डॉक्टर करीब 5-6 साल से सेंट्रल जेल में बतौर मेडिकल ऑफिसर तैनात था,करीब डेढ़ महीने पहले ही डॉक्टर का तबादला जेल से सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) हरिपुरधार हुआ था। तीन दिन के पुलिस रिमांड के बाद आरोपी डॉक्टर को अदालत ने न्यायिक हिरासत में सेंट्रल जेल भेजा था।

बता दे कि जेल में स्वास्थ्य अधिकारी की स्थाई नियुक्ति होती है, प्रथमिक उपचार के बाद ही कैदियों को मेडिकल कॉलेज रेफर किया जाता है।

उल्लेखनीय यह है कि मामले की गहन जांच और पूछताछ के दौरान पुलिस को इस पूरे नेटवर्क के बैकवर्ड लिंकेज में अहम सुराग मिले।

पूछताछ में आरोपियों ने खुलासा किया कि केंद्रीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) हरिपुरधार में तैनात डॉक्टर आदित्य शर्मा ने ही उन्हें हरियाणा के नारायणगढ़ से चिट्टा लाने के लिए भेजा था।

चिट्टा लाने के लिए स्कूटी (HP-18B-0444) का इस्तेमाल किया था। पुलिस की एसआईयू टीम ने स्थानीय युवकों को चिट्टे (हेरोइन) की खेप सहित दोसड़का के समीप नेचर पार्क के नजदीक से गिरफ्तार किया था।

गिरफ्तार आरोपियों की पहचान नाहन निवासी अभिमन्यु ठाकुर और भानु गर्ग के रूप में हुई थी। इनके कब्जे से 6.68 ग्राम हेरोइन बरामद की गई थी।

सूत्रों के अनुसार, जांच एजेंसियों को इस बात के भी संकेत मिले हैं कि डॉक्टर केवल नशा मंगवाने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें आर्थिक रूप से निवेश भी करता था।

साथ ही, उसके खुद भी नशे का सेवन करता था। पुलिस अब इस एंगल से भी जांच कर रही है कि कहीं यह एक संगठित नेटवर्क तो नहीं, जिसमें अन्य लोग भी शामिल हो सकते हैं।

उधर, इस पूरे मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग में भी हड़कंप मच गया है। मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) स्तर पर मामले की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर उच्च अधिकारियों को भेज दी गई है। विभागीय स्तर पर भी इस बात की जांच की जा रही है कि डॉक्टर की गतिविधियों पर पहले कोई संदेह क्यों नहीं हुआ।

नियमों के अनुसार, डॉक्टर को “डिम्ड सस्पेंशन” (स्वतः निलंबन) माना गया है। यदि कोई सरकारी कर्मचारी 48 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रहता है, तो उसे स्वतः निलंबित मान लिया जाता है और इसके लिए अलग से किसी लिखित आदेश की आवश्यकता नहीं होती।

फिलहाल पुलिस मामले की हर कड़ी को जोड़ने में जुटी हुई है। मोबाइल कॉल डिटेल, वित्तीय लेनदेन और अन्य संभावित संपर्कों की भी जांच की जा रही है।

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