दिल्ली कांग्रेस के लिए दूर ही नहीं बल्कि कोसों दूर

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हिमखबर- डेस्क

राजनीति में सफलता की मंजिल पाने के लिए समय समय पर शीर्ष नेतृत्व की समीक्षा करते रहना चाहिए ताकि राजनीति के बदलते समय के आधार पर यदि शीर्ष नेतृत्व अनुकूल नहीं दिखाई दे तो उसे बदला जा सके और नया चहेरे के नेतृत्व में आगे बढ़ने की परख की जा सके।

जब 1985 के चुनाव भाजपा केवल दो सीटों पर सिमट गई तो, भाजपा ने स्वर्गीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई एवं लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा को शिखर तक ले जाने के लिए कड़ी मेहनत करते हुए, रथ यात्रा, राम मंदिर, निर्माण मुद्दा एवं अन्य अनेकों प्रकार के मुद्दों को उजागर करते हुए, भाजपा के ग्राफ को काफी हदतक तक बढ़ाया।

अपने दम पर बहुमत नहीं मिलता देखकर भाजपा विचारधारा के मुख्य गैर राजनीतिक संगठन आर आर एस के माध्यम से शीर्ष नेतृत्व परिवर्तन पर मंथन करना शुरू किया और सारे राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को दर किनार करते हुए 2014 के चुनाव में क्षेत्रीय स्तर के नेता मोदी को भाजपा का नेतृत्व सौंपते हुए, प्रधानमंत्री के रूप में चुनाव मैदान में उतरा और परिणाम यह रहा कि भाजपा को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया और मोदी भाजपा दल की ओर से देश के प्रधानमंत्री बन गए।

2019 के चुनाव में भी मोदी के नेतृत्व में भाजपा को फिर बहुमत हासिल हुआ और मोदी फिर प्रधानमंत्री बन गए। अतः कांग्रेस पार्टी जो कभी बहुमत और कभी बिना बहुमत से चुनाव जीतने वाली बड़ी पार्टी बनकर सालों साल तक सत्ता में रहते हुए 2014 के बाद सत्ता से काफी दूरी पर पहुंच गई है ।

कांग्रेस 2014 के चुनाव में जिस स्तर पर खड़ी हुई थी 2019 के चुनाव में भी लगभग उसी स्तर पर सिमट गई है जबकि 2014 एवं 2019 के चुनाव में एक ही शीर्ष नेतृत्व ने चुनाव की बागडोर संभाली थी। अतः भाजपा की तर्ज पर कांग्रेस को भी शीर्ष नेतृत्व की कार्यप्रणाली एवं लोकप्रियता को जांच परख करने पर मंथन करना चाहिए।

ताकि किसी ऐसे चहेरे को शीर्ष नेतृत्व की बागडोर सौंपी जाए, जो कांग्रेस पार्टी को पुनः फर्श से अर्श तक पहुंचाने में सक्षम हो। अन्यथा अभी दिल्ली कांग्रेस के लिए दूर ही नहीं बल्कि कोसों दूर है।

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