हिमखबर डेस्क
तबाही की तस्वीर उस वक्त बेशक धुंधली थी, लेकिन जहन में सभी के था कि कुदरत से छेड़ोगे, तो जवाब भी कुदरत के हिसाब से मिलेगा। पहाड़ों पर विनाश की पटकथा तो बड़ी पहले से लिखनी शुरू हो गई थी, लेकिन नासमझ इनसान उसे विकास समझ कर इतराने लगा। कुरेद-कुरेद कर कभी न झुकने वाले पहाड़ों को हमने इतना खोखला कर डाला कि मानवता को मौत की दहलीज पर ले आए।
तरक्की के नाम पर हम खुद ही मौत का जाल बुनते गए और फिर उसमें ऐसे फंसे कि आंखों के सामने मानवता का विनाश होने लगा। देवों की भूमि कहे जाने वाला हिमाचल अब देवताओं के प्रकोप को सह रहा है और इस प्रकोप की वजह भी हम खुद हैं।
जहां पहले देवताओं के दर कई मील दूर पैदल चलकर गा-बजाकर पहुंचते थे, वहां अब हम शानदार गाडिय़ों में अंग्रेजी म्यूजिक लगाकर हो-हल्ला कर पहुंच रहे हैं। पहाड़ के इन खूबसूरत स्थलों पर गंदगी फैलाकर देवी-देवताओं को रूष्ट तो किया ही, साथ ही कुदरत की भी जहुन्नम बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
पहाड़ों का कर दिया चीरहरण
बरसात का प्रकोप पहले भी होता था। बारिश भी बहुत होती थी, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जो विनाश शुरू हुआ है, वह पहले कभी नहीं देखा। वजह साफ है पहले कुदरत के बनाए रास्ते थे, जिसकी सुरक्षा भी खुद प्रकृति करती थी, देवी-देवता करते थे, पर अपने सुख के लिए इनसान ने खुद को इतना लाचार बना लिया कि आंगन तक सडक़ें पहुंचा दीं और वह भी पहाड़ों का चीरहरण कर।
भारी मशीनों से तोड़-फोड़ कर, बड़े-बड़े ब्लास्ट कर पहाड़ों की जड़ें हिला दीं। अंधाधुंध पेड़ों का कटान कर डाला। यही पेड़ पहाड़ों के रक्षक थे, लेकिन लालच में आकर इनका अंधाधुंध कटान कर डाला। यही वजह है कि अब खुद देश की सर्वोच्च न्यायपालिका को इस पर हस्तक्षेप करना पड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता, सरकार से मांगा जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि हिमाचल सहित उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में पेड़ों के अवैध कटान के कारण प्राकृतिक आपदाएं आई हैं। मामले में कोर्ट ने केंद्र सरकार, एनडीएमए और अन्य राज्यों को नोटिस जारी कर जवाबतलब किया है।
शीर्ष अदालत ने मीडिया में आ रही खबरों का जिक्र किया और कहा कि हमने मीडिया रिपोर्टों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में अभूतपूर्व भूस्खलन और बाढ़ देखी है। इससे पता चला है कि बाढ़ में भारी संख्या में लकड़ी के ल_े बह रहे थे। प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है पहाडिय़ों पर पेड़ों की अवैध कटाई हो रही है।
पीठ की ओर से मुख्य न्यायाधीश गवई ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा है। इस पर श्री मेहता ने कहा कि वह आज ही पर्यावरण मंत्रालय (केंद्र सरकार के) के सचिव से बात करेंगे, ताकि संबंधित राज्यों के मुख्य सचिवों से संपर्क किया जा सके।
किसने बुन दिया मौत का जाल
पीठ के समक्ष याचिकाकर्ता अनामिका राणा के अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि चंडीगढ़ और मनाली के बीच चौदह सुरंगें हैं। ये सुरंगें बारिश के दौरान भूस्खलन से लगभग मौत का जाल बन जाती हैं। अधिवक्ता ने सुरंग में करीब 300 लोगों के फंसे होने की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया।
हिमाचल में इस बार मानसून सीजन के दौरान अब तक कुल 3,69,041.76 लाख रुपए की संपत्ति का नुकसान हो चुका है। प्रदेश में इस मानसून सीजन में 20 जून से 3 सितंबर तक 343 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जबकि 398 लोग घायल हुए हैं। 43 लोग अभी भी लापता हैं।
बादल फटने, भूस्खलन, बाढ़ से अब तक 5,319 कच्चे-पक्के घरों, दुकानों को क्षति हुई है। यह नुकसान पहली बार नहीं हुआ है। हर साल मानसून कहर बरपाता है, लेकिन विकास के नाम पर हम विनाश की कहानी भी लगातार लिखते जा रहे हैं।

