हिमखबर डेस्क
हिमाचल प्रदेश के आर्थिक इतिहास में आज का दिन बेहद निर्णायक साबित होने वाला है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू अपने कार्यकाल का चौथा बजट पेश करने जा रहे हैं, जो केवल आंकड़ों का लेखा-जोखा नहीं, बल्कि 2032 तक प्रदेश को देश के सबसे संपन्न राज्य के रूप में स्थापित करने की एक महत्त्वाकांक्षी योजना का ब्लूप्रिंट भी है। आज का यह बजट ‘करो या मरो’ वाली स्थिति में पेश किया जा रहा है, क्योंकि राज्य को केंद्र से मिलने वाली राजस्व घाटा ग्रांट (RDG) 1 अप्रैल से समाप्त हो रही है।
बजट के मुख्य आकर्षण और रणनीतिक बदलाव
मुख्यमंत्री के इस पिटारे में राज्य की किस्मत बदलने के लिए सात खास स्तंभों पर दांव लगाया गया है। पर्यटन, ऊर्जा और खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) जैसे क्षेत्रों को निवेश का केंद्र बनाकर आय बढ़ाने की योजना है। डेटा स्टोरेज और शिक्षा में आधुनिक बदलावों के जरिए युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर तलाशने की कोशिश होगी। गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और चिकित्सा सुविधाओं के ढांचे को अपग्रेड करने के लिए विशेष प्रावधान संभव हैं।
हिमाचल इस समय एक दोहरी तलवार पर चल रहा है। एक तरफ राज्य पर 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज का बोझ है, वहीं दूसरी तरफ हर महीने वेतन और पेंशन की अदायगी के लिए करीब 2800 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि की दरकार रहती है।
सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बिना आम जनता पर बोझ डाले कैसे राजस्व बढ़ाती है और वित्तीय अनुशासन बनाए रखती है। जानकारों का मानना है कि बजट का कुल स्वरूप पिछले वर्ष के 58,514 करोड़ रुपये के आंकड़े के आसपास ही सिमटा रह सकता है।
उम्मीदों का भारी बोझ
- सुबह 11 बजे जब मुख्यमंत्री अपना भाषण शुरू करेंगे, तो सबकी निगाहें उन पर होंगी।
- सरकारी कर्मचारी व पेंशनर: एरियर और भत्तों को लेकर आस लगाए बैठे हैं।
- विधायक: अपने क्षेत्रों के लिए विकास निधि और नई योजनाओं की प्रतीक्षा में हैं।
- आम नागरिक: महंगाई के बीच राहत और स्वरोजगार के अवसरों की उम्मीद कर रहे हैं।

