जानिए प्रौल़ी वाली देवी की कथा

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बात पुराने समय की है । उस समय की जब छतराड़ी (भरमौर)एक जंगल था । जंगल में दूर कहीं -कहीं राक्षस रहते थे और कहीं -कहीं देवता भी रहते थे । आज का छतराड़ी गांव तो बड़ी बाद में बसा। पहले यहां मेढ़ी नाम का गांव हुआ करता था । मेढ़ी में छतराड़ी देवता का बास था जहां पर सात देवियां बहनें रहती थीं । सभी इकट्ठा रहती । उनका आपस में बड़ा प्रेम था ।

वक्त गुज़रता गया । दिन बीते -रात बीती । बढ़ते ध्याड़ों के साथ सातो बहनें भी जवान हो गई। उन सबमें अलगाव की भावना पैदा हो गई । सब एक दूसरी से अलग रहने का सोचने लगीं । एक दिन वे सब इक्कट्ठी हुईं और सलाह की कि अब अपनी दौलत आपस में बराबर-बराबर बांट ली जाये ।

उनके पास रूपया – सोना ढेरों था अतः समस्या आन खड़ी हुई कि धन बांटा कैसे जाये । सलाह हुई की गांव से किसी घर से त्रकड़ी (तराजू) मंगवाया जाये और फिर दौलत बराबर-बराबर बांटी जाये । बड़ी बहनों ने सबसे छोटी बहन को हुक्म दिया -” तुम मढ़ी गांव जाओ और गांव में त्रकड़ी ले आओ ,जाओ जल्दी जाओ “।

छोटी बहन ने उनका हुक्म सर माथे पर लिया और दौड़ती हुई मढ़ी गांव जा पहुंची । वहां उसने एक घर में देखा कि एक बूढ़ी औरत छाछ छल रही थी । लड़की ने बूढ़ी का अभिवादन किया और कहा -अम्मा !अम्मा! त्रकड़ी चाहिये “।

बूढ़ी लड़की की ओर एकटक देखती रही फिर बोली – ” कुड़िये ! मैं तो छाछ छल रही हूं – अपना काम छोड़कर त्रकड़ी कहां से ढूंढ कर दूं “।

लड़की बोली-” लाओ अम्मा ! छाछ में छलती हूं । तुम त्रकड़ी ढूंढ कर लाओ “।

बूढ़ी औरत ने लड़की को छाछ छोलने में लगा दिया और स्वयं घर के अंदर त्रकड़ी ढूंढने चली गई । वो कुछ देर त्रकड़ी ढूंढती रही और फिर यह देखने बाहर आ गई कि लड़की छाछ छोलने का काम ठीक ढंग से कर रही है कि नहीं ।

बाहर आकर उसने देखा कि लड़की अपने काम में पूरी तनमन्यता से लगी हुई थी और मक्खन के लिये रखा वरतन मक्खन से लबालब भरा हुआ था । बूढ़ी औरत अनुभवी थी झट्ट से समझ गई कि यह लड़की कोई देवी है ।

उसके मन में लालच आ गया । उसने उसे तब तक छाछ छोलने में लगाये रखा जब तक कि काम पूरा न हुआ और स्वयं त्रकड़ी ढूंढने का बहाना करती रही । जब लड़की सारी छाछ छोल बैठी तब उसने उसे त्रकड़ी दी ।

उधर दूसरी ओर छहों बहने छोटी बहन का इंतजार बड़ी बेसब्री से कर रही थी ।वे दौलत के लिये अधीर हुई जा रहीं थीं । जब छोटी बहन बड़ी देर तक न आई तो उन्होंने अधीरता में विना त्रकड़ी के ही अनुमान से छह हिस्से किये और सारी दौलत आपस में बांट ली । छोटी बहन के लिये कुछ भी नहीं बचा ।

छोटी बहन दौड़ती-दौड़ती त्रकड़ी लेकर घर पंहुची तो देखा कि दौलत बंट चुकी थी और उसके लिये कुछ न बचा था । छोटी बहन के पास अब रोने के सिवा दूसरा कोई चारा न था । वह जोर-जोर से रोने लगी । वह अब इधर-उधर घूमती रहती और रोती रहती ।

चलते-चलते उसे कई बार ठोकरें लगीं वह कई बार गिर पड़ी । गिरने से कई जगह चोटें भी लगीं और खून भी निकल आया । जहां-जहां उसका खून गिरा वहां कि मिट्टी लाल हो गई और जहां-जहां उसके आंसुओं की बूंदें गिरीं वहां की मिट्टी काली हो गई । ये काली और लाल मिट्टी आज भी मंदिर के चारों ओर फैली हुई है ।

जब वह बड़ी ज्यादा रोने लगी तो राह मे उसे गणेश मिले। उन्होंने उसको दिलासा दिया तब जाकर वह चुप हुई और गणेश ने उसकी याद में वहां पर एक मंदिर बना दिया जोकि आज भी वहां पर स्थित है और “प्रोली वाली भगवती रा मन्दिर” नाम से जाना जाता है ।

वे सातों बहने सात अलग-अलग जगह जाकर बसीं और सातों जगह मंदिर बने । यह मंदिर हैं —

सगती देवी छतराड़ी ,चम्बे चामुंडा,चुराह बैखाली,कांगड़े भवानी,लाहुल मिरकुला,भरमौर लखणा और प्रौली वाली भगवती छतराड़ी ।

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