हिमखबर डेस्क
देशभर में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्यौहार मनाया गया। कुल्लू के सुल्तानपुर स्थित सत्यनारायण मंदिर में भी बड़ी धूमधाम से जन्माष्टमी का त्यौहार मनाया गया। मंदिर में श्रद्धालुओं ने भजन कीर्तन कर भगवान श्री कृष्ण का जन्म उत्सव मनाया। देर रात तक भजन और कीर्तन का दौर चलता रहा। इस दौरान मंदिर में खीरे से भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। मंदिर पहुंचे भक्तों ने प्रभु का आशीर्वाद प्राप्त किया।
स्थानीय निवासी कार्तिकेय सूद के बोल
सुल्तानपुर के रहने वाले कार्तिकेय सूद ने बताया कि ‘सत्यनारायण मंदिर में जन्माष्टमी का त्यौहार हर साल मनाया जाता है। यहां कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि शुरू होने पर रात्रि में 12 बजे श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। जन्माष्टमी पर यहां भगवान खीरे में से जन्म लेते हैं। ऐसे में श्रद्धालुओं के लिए यह प्रकटोत्सव बेहद खास रहता है।
स्थानीय निवासी अनीता शर्मा के बोल
सुल्तानपुर की रहने वाली अनीता शर्मा ने बताया कि हम हर साल ही भगवान श्रीकृष्ण की जन्माष्टमी देखने के लिए आते हैं। कुल्लू की खास बात है कि सत्यनारायण मंदिर में पहले दिन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाता है, जबकि भगवान रघुनाथ मंदिर और अन्य मंदिरों में आज भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मनाया जाएगा।
पुजारी जयंत मोदगिल के बोल
सत्यनारायण मंदिर के पुजारी जयंत मोदगिल ने बताया कि ‘कई पीढ़ियों से हमारा परिवार मंदिर में पूजा करने का काम कर रहा है। इस प्राचीन मंदिर में हर साल श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के दिन सभी श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। भजन कीर्तन करते हैं। यहां खीरे में से भगवान का जन्म देखने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है।
आचार्य दीप कुमार के बोल
आचार्य दीप कुमार का कहना हैं कि ‘जन्माष्टमी के दिन भगवान कृष्ण की मूर्ति को खीरे के भीतर ऐसे रखा जाता है मानो वो माता के गर्भ में हों, जिस प्रकार माता देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और वो कारागार से मुक्त होकर नंद के घर पहुंचे थे। उसी प्रकार खीरे को चीरकर उसके बीज अलग किए जाते हैं।
हालांकि, जन्माष्टमी के दिन भगवान के जन्म से पहले खीरे का सेवन नहीं किया जाता, बल्कि आधी रात के बाद ही इसका प्रसाद लिया जाता है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म अर्धरात्रि में हुआ था। इसलिए ठीक 12 बजे मंदिर में खीरे को काटा जाता है। इसे उनके जन्म का प्रतीक माना जाता है।
दीप कुमार ने बताया कि ‘धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन खीरे को गर्भ का प्रतीक माना जाता है और उसमें भगवान को स्थापित करना उनके अवतार की याद दिलाता है। ये परंपरा भक्त और भगवान के बीच एक गहरा आध्यात्मिक जुड़ाव भी स्थापित करती है।
खीरे को काटना बंधन से मुक्ति, अंधकार से प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय का संकेत देता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण को शीतलता प्रिय थी। ये भी माना जाता है कि खीरे का प्रसाद ग्रहण करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।