कोटे वाली माता मंदिर: यहां हर मनोकामना होती है पूरी, हिमाचल के इस जिले में है यह मंदिर

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हिमखबर डेस्क

देवभूमि हिमाचल प्रदेश में कई ऐसे शक्तिपीठ और मंदिर हैं जिनकी दुनियाभर में मान्यता है। इन्हीं में से एक हैं कोटे वाली माता मंदिर, जिसे लेकर मान्यता है कि यहां व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है। राजा का तालाब कस्बे से चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पहाडिय़ों पर माता कोटे वाली का भव्य मंदिर विराजमान है।

माता कोटे वाली मंदिर के प्रति लोगों की विशेष आस्था होने की वजह से माता के भक्त वर्ष भर दर्शन के लिए आते हैं। स्कूली छात्र परीक्षाओं के समय माता से मन्नत मांगते हैं कि वह उत्तीर्ण होने पर माता के दरबार में हाजिरी लगाने जरूर आएंगे। नव विवाहित जोड़े भी अपनी जिंदगी की नई शुरुआत करने से पहले माता कोटे वाली मंदिर में माथा टेकना कभी नहीं भूलते हैं।

श्रद्धालुओं की आमद मंदिर में सदैव चली ही रहती है, जिसकी वजह से इस मंदिर के प्रति लोगों का अटूट विश्वास है। किसी भी व्यक्ति की जब कोई मनोकामना पूरी होती है, तो लोग बैंड, बाजों साथ मंदिर तक पहुंचते हैं। माता कोटे वाली मंदिर में कोई भी व्यक्ति रात को ठहर नहीं सकता है।

मान्यता

अष्टभुजा माता रात को साक्षात प्रकट होकर यहां विभिन्न लीलाएं करती हैं। अगर गलती से रात को मंदिर में ठहरने की कोई कोशिश करता, तो सुबह तक वह जीवित नहीं रहता ऐसी भी मान्यता है।

12वीं शताब्दी में दिल्ली के शासक आनंदपाल तोमर ने दिल्ली का सिंहासन अपने दोहते पृथ्वीराज राज चौहान को सौंपा। आनंद पाल तोमर के सगे संबंधियों ने दिल्ली में आखिर विद्रोह का बिगुल बजा दिया।

इस विद्रोह का लाभ उठाते हुए राजस्थान कोटा और बूंदी में पृथ्वीराज राज चौहान के संबंधियों ने भी उसके खिलाफ विद्रोह की आवाज मुखर कर डाली थी। पृथ्वीराज राज चौहान ने अपने सगे संबंधियों के विद्रोह को कुचलकर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। विद्रोही पृथ्वीराज राज चौहान से अपनी जान बचाने के लिए उत्तर के घने जंगलों की तरफ भागना शुरू हो गए।

भागते समय यह लोग अपने साथ अपनी कुल देवी को भी ले आए तथा कोटे वाले जंगल में स्थापित कर दिया। कोटे वाली माता के नाम से मंदिर आज नूरपुर ही नहीं अपितु हिमाचल से सटे पंजाब और जम्मू-कश्मीर में भी प्रसिद्ध है। जैसे-जैसे इस माता की चर्चा बढऩे लगी, वैसे-वैसे माता के मंदिर की आस्था भी बढऩे लगी और हजारों की संख्या में यहां श्रद्धालु आने लगे। माता से मन्नतें मांगने लगे।

मंदिर 300 सीढिय़ां चढक़र अत्यंत रमणीक एवं आकर्षक पहाडिय़ों पर स्थित है। यहां 25 दुकानें और कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां सुसज्जित हैं। श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद, चायपान और विश्राम करने की पूरी व्यवस्था मंदिर कमेटी की और से की गई है। वर्ष भर मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता मंदिर में लगा रहता, परंतु नवरात्रों दौरान यह भीड़ कई गुणा बढ़ जाती है।

इस दौरान राजा का तालाब बाजार की मंदिर कमेटी के सहयोग से यहां भंडारे का आयोजन करके मानवता की सेवा करती आ रही है। माता कोटे वाली मंदिर की देखरेख 1971 से गुरियाल गांव की एक कमेटी कर रही है। कमेटी की ओर से मंदिर का भव्य निर्माण करवाकर श्रद्धालुओं को हर सुविधा पहुंचाई जाती है।

गुरियाल गांव से मंदिर तक लगभग दो किलोमीटर का दुर्गम पहाड़ी रास्ता है। राजा का तालाब डक रोड पर माता कोटे वाली मंदिर के नाम से एक भव्य द्वार बनाया गया है। इस चौक से माता के भक्त चार पहिया वाहनों से सवार होकर माता के चरणों तक पहुंचते हैं।

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