हिमखबर डेस्क
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के उस अंतरिम आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा ओबीसी आयोग को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने के फैसले पर रोक लगाई गई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया की पीठ ने कहा कि ऐसे मुद्दे नीतिगत निर्णयों से जुड़े होते हैं और सामान्यत: न्यायिक क्षेत्राधिकार में नहीं आते।
पीठ ने उच्च न्यायालय से कहा कि वह राज्य सरकार के जवाब पर विचार करते हुए ओबीसी आयोग के स्थानांतरण के खिलाफ दायर याचिका पर निर्णय करे। अदालत ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर उच्च न्यायालय में अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दी।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां मुख्य रूप से अंतरिम आदेश से संबंधित हैं और इससे मामले के अंतिम फैसले पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रारंभ में पीठ ने कहा कि सामान्यत: ओबीसी आबादी कांगड़ा और आसपास के क्षेत्रों में रहती है और ऐसे निर्णय आमतौर पर जनहित में लिए जाते हैं, इसलिए इन्हें प्राय: न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं माना जाता।
इससे पहले उच्च न्यायालय ने 9 जनवरी को राज्य सरकार के उस फैसले पर रोक लगा दी थी, जिसमें हिमाचल प्रदेश राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के कार्यालय को शिमला से धर्मशाला स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया था। उच्च न्यायालय ने कहा था कि इस मामले में गहन न्यायिक जांच की आवश्यकता है।
मुख्य न्यायाधीश जीएस संधावालिया और न्यायमूर्ति अंकित की खंडपीठ ने यह अंतरिम आदेश रामलाल शर्मा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया था, जिसमें 7 जनवरी के राज्य सरकार के फैसले को चुनौती दी गई थी। याचिका में आयोग के मुख्यालय को शिमला से जिला कांगड़ा के धर्मशाला स्थानांतरित करने के निर्णय का विरोध किया गया था, जबकि अध्यक्ष के लिए शिमला कार्यालय को कैंप कार्यालय के रूप में बनाए रखने की बात कही गई थी।

