अहोई अष्टमी व्रत 2026 इस बार 1 नवंबर को रखा जाएगा, जानें अहोई अष्टमी पूजा का शुभ मुहूर्त, तारों को देखने का समय, पूजा विधि, महत्व और व्रत कथा।
शाहपुर – नितिश पठानियां
हिंदू पंचांग के अनुसार, कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 1 नवंबर 2026 को दोपहर 02 बजकर 51 मिनट से लेकर 2 नवंबर को दोपहर 01 बजकर 10 मिनट तक रहेगी।
शाहपुर के ज्योतिषी आचार्य पंडित अमित कुमार शर्मा के अनुसार, अष्टमी तिथि में चंद्र और तारों का दर्शन 1 नवंबर को होगा, इसलिए यह व्रत 1 नवंबर दिन रविवार को ही रखा जाएगा।
अहोई अष्टमी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत संतान की रक्षा, लंबी आयु और परिवार की खुशहाली के लिए किया जाता है। मान्यता है कि अहोई माता की पूजा करने से संतान के जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं संतान के अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना करती हैं व अहोई माता को देवी दुर्गा का स्वरूप माना जाता है. व्रत के दौरान माता की पूजा करने के साथ अहोई अष्टमी की कथा सुनने या पढ़ने की परंपरा है।
अहोई अष्टमी की पूजा विधि
सुबह उठकर स्नान करें और घर के मंदिर में पूजा करके व्रत का संकल्प लें। अहोई माता की तस्वीर घर के मंदिर में स्थापित करें। चाहें तो आस-पास स्थित अहोई माता के मंदिर में भी पूजा कर सकती हैं। रोली, चावल, फूल और भोग-प्रसाद जैसी पूजा सामग्री से माता की आराधना करें।
अहोई अष्टमी की व्रत कथा सुनें या पढ़ें. संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना करें। शाम को तारों के दर्शन करके अर्घ्य दें. इसके बाद परंपरा के अनुसार व्रत का पारायण करें।
अहोई अष्टमी व्रत कथा
अहोई अष्टमी की प्रचलित कथा के अनुसार, एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएं और एक बेटी थी। दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए परिवार की महिलाएं मिट्टी लेने गईं। खुदाई के दौरान साहूकार की बेटी से अनजाने में सेहू के बच्चों की मृत्यु हो गई।
इससे क्रोध में आकर सेहू ने उसे श्राप दे दिया। तब साहूकार की छोटी बहू ने आगे बढ़कर श्राप अपने ऊपर लेने की बात कही। कथा के अनुसार, इसके बाद बारी-बारी उसके बच्चों की मृत्यु होने लगी।
परिवार के दुखी होने पर एक पंडित ने गौ माता की सेवा करने का उपाय बताया है। छोटी बहू ने गौ माता की सेवा की, जिससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसकी सहायता की।
बाद में सेहू ने श्राप वापस ले लिया और छोटी बहू को संतान सुख प्राप्त हुआ. इस कथा का मुख्य भाव अनजाने में हुई गलतियों के प्रति पश्चाताप, सेवा और पुण्य कर्मों के महत्व से जुड़ा है।



