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धौलाधार की गोद में सैर का उल्लास, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व

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सैर (सायर): धौलाधार के आंचल में महसूस हुई राहत और जीवन ने कहा—धन्यवाद, सैर यानी सायर हिमाचल की समृद्ध लोक परंपरा और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता से जुड़ा पर्व है। धौलाधार के आंचल में मनाया जाने वाला यह उत्सव जीवन, राहत, खुशहाली और प्रकृति के प्रति धन्यवाद की भावना को अभिव्यक्त करता है।

शाहपुर – नितिश पठानियां

आज सूर्य देव सिंह राशि से निकलकर कन्या राशि में प्रवेश कर रहे हैं। आश्विन मास की यह संक्रांति कांगड़ा की धरती पर केवल पंचांग की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब पहाड़ अपनी मिट्टी, खेत, फसलों, पानी और जीवनदायिनी प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है। कांगड़ा में इसी संक्रांति को सैर या सायर के नाम से मनाया जाता है।

सायर को समझना हो तो आइए कुछ पल के लिए आज के शोर-शराबे से दूर उस पुराने पहाड़ी जीवन की ओर लौट चलें, जहाँ न पक्की सड़कें थीं, न मजबूत पुल, न अस्पताल और न ही संचार के साधन। बरसात आती थी तो पहाड़ का मिजाज ही बदल जाता था।

नाले-खड्ड भी भर-भरकर आते थे, खड्डें उफान पर आ जातीं, रास्ते बह जाते, कच्चे पुल टूट जाते और एक गाँव का दूसरे गाँव से संपर्क भी टूट जाता। कहीं ल्हासे गिरते, कहीं खेत बह जाते और कहीं पानी ही बीमारी का कारण बन जाता।

मानसून खेती के लिए वरदान तो था, लेकिन पुराने समय में यही बरखा पहाड़ के लोगों के लिए एक बड़ी परीक्षा भी होती थी। आसमान से बरसता पानी जैसे धरती को जीवन देता था, वैसे ही उफनते नाले-खड्ड और खड्डें जीवन के लिए खतरा बन जाते थे।

चिकित्सा सुविधाएँ न के बराबर थीं। दूषित पानी और संक्रामक बीमारियों के कारण बरसात के ये महीने अनेक परिवारों के लिए भय और चिंता लेकर आते थे। इतिहास में ऐसे अनेक दौर मिलते हैं जब वर्ष के इन्हीं बरसाती महीनों में बीमारी और कठिन परिस्थितियों से भारी जनहानि हुई।

ऐसे समय में जिसने इस कठिन मौसम को सकुशल पार कर लिया, उसके लिए सायर महज कोई त्योहार नहीं था। वह जिंदगी के सलामत बच निकलने की खुशी थी। वह राहत की साँस थी। वह ईश्वर के आगे सिर झुकाकर धन्यवाद देने का दिन था।

सायर आते ही चूल्हे फिर से जल उठते थे, सूखी लकड़ियाँ मिलना शुरू हो जाती थीं। बरसात की उदासी के बीच धुएँ की खुशबू में त्योहार और महक जाते थे। काले बादलों के बीच अचानक सूरज की एक किरण निकलते हुए आकर कह रही हो—अब डरने की जरूरत नहीं, कठिन घड़ी गुजर गई।

सन् 1883 के कांगड़ा गजेटियर में भी सैर (सायर) पर्व के व्यापक रूप से मनाए जाने का उल्लेख मिलता है। उस समय कांगड़ा के साथ-साथ पहाड़ी क्षेत्रों में यह पर्व हर्षोल्लास से मनाया जाता था और कई दिनों तक इसकी रौनक रहती थी। पुराने समय में तो सायर का उत्सव एक सप्ताह तक चलने की परंपरा भी बताई जाती है। आज से सात-आठ दशक पहले तक भी कई स्थानों पर इसका रंग एक-दो दिन तक सीमित नहीं था।

सायर की सुबह अपने आप में एक सुंदर लोक-कथा हुआ करती थी।

घर के आँगन में पूजा की थाली सजती, मंदलु अर्थात गोलुआं, हरमुन्जी व चावल के आटे के घोल से रंगोली सजती थी। एक बांस की टोकरी में मक्की का भुट्टा, धान का पौधा, ककड़ी, नया अखरोट और घट्टा रखा जाता।

ये चीजें केवल पूजा की सामग्री नहीं थीं; इनमें पहाड़ी जीवन की पूरी कहानी समाई थी। खेत में बोया गया बीज, बरखा से पनपा धान, धरती की उपज और नए मौसम का अखरोट—सब मिलकर जैसे किसान की पूरी दुनिया को एक थाली में रख देते थे।

मानो धरती से संवाद करते हुए कहा जाता हो—

“धरती माता,
तूने बीज को अन्न बनाया,
बरखा ने खेतों को जीवन दिया और ईश्वर ने हमें संभाला।
तेरे प्रति कृतज्ञ होकर
हम शीश नवाते हैं।”

यही तो सायर की आत्मा है—धरती के प्रति कृतज्ञता, प्रकृति के प्रति सम्मान, ईश्वर के प्रति आस्था और जीवन के प्रति उत्सव।

सायर से एक दिन पहले तो घर-घर रसोई महक उठती थी। अरबी के पत्तों के पतरोड़े, मीठी और नमकीन मठियाँ, खीर, तले हुए भटूरू, मीठे अलग-अलग डिजाइन के गुलगुले, दही, भल्ले—कितने ही पकवान बनते। चूल्हे पर कड़ाही छनकती और आँगन में बच्चों की चहल-पहल रहती।

सायर मनाने के लिए न कोई औपचारिक निमंत्रण होता, न कोई दिखावा। बस अपनेपन की एक छोटी-सी थाली और उसमें भरा हुआ बड़ा-सा प्रेम। थाली में पकवान कम और रिश्ते ज्यादा होते थे।

सैर (सायर) की अपनी एक पारिवारिक परंपरा भी है। भादों का काला महीना शुरू होते ही नई-नवेली बहुएँ अपने मायके चली जाती थीं। विवाह के बाद पहले काले महीने में बहू का सास के साथ रहना शुभ नहीं माना जाता था। इसलिए वह पूरा महीना मायके में बिताती। फिर सायर आता तो जैसे बेटी की वापसी का संदेश लेकर आता।

“सायर आई गया, हुण धी फेरी घरे आई।”

सायर के दिन नई-नवेली बहू के ससुराल लौटने से घर का आँगन फिर रौनक से भर जाता। इस तरह सायर केवल खेत और फसल का पर्व नहीं था; यह मायके और ससुराल, बेटी और माँ, बहू और सास—इन रिश्तों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक डोर भी था।

अखरोट खेलते बच्चे, प्रतिस्पर्धा करते वातावरण में खुशी को महकाते थे। हाथ में अखरोट, चेहरे पर मुस्कान और गलियों में दौड़ती टोलियाँ। पुराने समय में बच्चे और जवान सायर के दिन अखरोटां नाल खेलदे हुए जगह-जगह दिखाई देते थे। अखरोट केवल खाने की चीज नहीं था; वह खेल था, उमंग था और सायर की पहचान था।

समय बदला। सड़कें आईं, पुल मजबूत हुए, अस्पताल आए, संचार के साधन आए और दुनिया हमारी हथेली में सिमट गई। इसके साथ हमारी जीवन-शैली भी बदल गई। जो सायर कभी कई दिनों तक गाँव-गाँव में रौनक बिखेरता था, वह धीरे-धीरे एक दिन की रस्म में सिमटता गया।

लेकिन अच्छी बात यह है कि सायर अभी भी जन-मानस में गहरी छाप छोड़े हुए है।

आज भी कांगड़ा के घरों में पतरोड़े बनते हैं, मठियाँ छनती हैं, खीर पकती है, भटूरू और मीठे गुलगुले बनते हैं। आज भी पूजा की थाली में मक्की का भुट्टा, धान का पौधा, ककड़ी और नया अखरोट अपनी जगह बनाए हुए हैं। आज भी कई घरों में सायर माता की पूजा होती है और रिश्तेदारों-पड़ोसियों के घर थाली भेजने की परंपरा निभाई जाती है।

यही हमारी लोक-संस्कृति की ताकत है।

संस्कृति केवल किताबों में नहीं रहती। वह दादी के चूल्हे की आँच में रहती है, माँ के हाथों के पतरोड़े में रहती है, पड़ोसी के घर भेजी गई थाली में रहती है, खेत में खड़े धान के पौधे में रहती है और उस बच्चे की हथेली में रहती है जिसमें सायर का अखरोट चमक रहा होता है।

आज की पीढ़ी भले ही आधुनिकता की दौड़ में अपनी कई पुरानी परंपराओं से दूर होती जा रही हो, लेकिन सायर हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देता है। यह याद दिलाता है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को केवल संसाधन नहीं माना था—वे उसके साथ जीते थे, उससे डरते भी थे, उससे प्रेम भी करते थे और उसकी कृपा के लिए आभार भी व्यक्त करते थे।

इसलिए सायर केवल आश्विन संक्रांति नहीं है। यह उस पहाड़ की सामूहिक स्मृति है जिसने बरसात की कठिन रातें देखीं, नालों और खड्डों के उफान सहे, बीमारियों और विपत्तियों का सामना किया और फिर जब आसमान साफ हुआ तो अपने आँगन में दीया जलाकर कहा—

“जिंदगी बची है, अन्न मिला है, खेत हरे हैं—इससे बड़ा उत्सव और क्या हो सकता है!”

आइए, इस सायर पर हम केवल एक-दूसरे को शुभकामना न दें, बल्कि अपनी आने वाली पीढ़ी को सायर की कहानी भी सुनाएँ। उन्हें बताएँ कि यह त्योहार हमारे पहाड़ की मिट्टी, मेहनत, मौसम, रिश्तों और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता की कहानी है।

सैर (सायर) उत्सव की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

ईश्वर करे यह पर्व हर गाँव, हर आँगन और हर परिवार में सुख, शांति, स्वास्थ्य, अन्न-धन और समृद्धि लेकर आए। हमारी पहाड़ी बोली, लोक परंपराएँ, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक इसी तरह जीवंत रहें।

Regards
अधिवक्ता दिशांत जरियाल ज्वाली

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