300 करोड़ का घोटाला पकड़ने पर छीन लिया था मेरा केंद्रीय मंत्री पद: शांता

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धर्मशाला,राजीव जस्वाल

मार्गदर्शक मंडल के सदस्य एवं पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार की आत्मकथा निज पथ का अविचल पंथी ने भाजपा की राजनीति में सियासी हलचल मचा दी है। अपनी आत्मकथा में शांता ने अटल सरकार के कार्यकाल के दौरान ग्रामीण विकास मंत्रालय में हुए 300 करोड़ के घोटाले का खुलासा करने पर उनका केंद्रीय मंत्री पद छीनकर ईमानदारी की सजा देने की पीड़ा जाहिर की है। शांता ने आत्मकथा में यह बात मानी है कि वर्ष 2003 में ग्रामीण विकास मंत्री रहे वेंकैया नायडू के मंत्रालय में 300 करोड़ का घोटाला हुआ था।

उन्होंने घोटाले को दबाने से मना किया तो बड़े नेताओं के दबाव में ग्रामीण विकास मंत्री पद छीन लिया गया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, आरएसएस, संसदीय कार्य मंत्री रहे प्रमोद महाजन सहित किसी भी नेता ने उनका साथ नहीं दिया था। कहा कि उस वक्त पार्टी छोड़कर लोकसभा में प्रमाणों सहित घोटाले का खुलासा करने का मन बना लिया था, लेकिन पत्नी संतोष शैल्जा ने ऐसा करने से रोक लिया। पत्नी ने समझाया कि मैंने पूरा जीवन जिस पार्टी के लिए लंबा संघर्ष किया, उसे इतनी बड़ी हानि होगी कि मैं स्वयं उसके लिए खुद को कभी क्षमा नहीं कर सकूंगा।

शांता ने बताया, कैसे पकड़ा था घोटाला
आत्मकथा में शांता ने लिखा है कि वर्ष 2003 में ग्रामीण विकास मंत्री वेंकैया नायडू को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनका ग्रामीण विकास मंत्रालय मुझे दिया गया। कुछ दिन बाद तमिलनाडु के दो सांसद मिलने आए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में आंध्र प्रदेश को 90 करोड़ स्वीकार किए गए थे, लेकिन मंत्रालय से जब पत्र जारी हुआ तो 90 करोड़ का 190 करोड़ कर दिया गया।

तीन वर्ष से आंध्रप्रदेश को प्रति वर्ष 100 करोड़ अधिक जा रहा है। लोकसभा में भी यह प्रश्न लगने नहीं दिया गया। शांता ने लिखा है कि उन्होंने आरोपों के आधार पर जब जांच की आरोप सही निकले। जांच में पाया गया कि योजना आयोग की फाइल में स्वीकृत राशि 90 करोड़ थी। मंत्रालय से जब धन भेजा गया तो 190 करोड़ भेजा गया। अधिकारियों से जब पूछा तो उनके पास कोई जवाब नहीं था।

अटल, आडवाणी, प्रमोद महाजन को बताई थी घोटाले की बात

शांता ने लिखा है कि उन्होंने 300 करोड़ के घोटाले की फाइल संसदीय कार्य मंत्री प्रमोद महाजन को भी दिखाई। उन्होंने मुझे बताया कि इस विभाग के उस समय जो मंत्री थे, वह अब पार्टी के अध्यक्ष हैं। इसलिए चिंता छोड़ो और यह सब भूल जाओ। फिर मैंने फाइल प्रधानमंत्री को भी दिखाई। अटल जी हैरान होकर कहने लगे यह क्या हो रहा है। फिर चुप हो गए। लालकृष्ण आडवाणी, योजना आयोग के अध्यक्ष केसी पंत को भी यह बात बताई। किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।

वेंकैया नायडू मुझसे नाराज थे
शांता ने किताब में लिखा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडू मुझसे नाराज थे, क्योंकि मैंने उनके प्रदेश को हर साल मिलने वाला 100 करोड़ रोक दिया था। मेरे खिलाफ अपनी ही पार्टी के हिमाचल और देश से कुछ नेता एकजुट हो गए। मुझ पर अनुशासनहीनता के आरोप लगाकर अटल जी पर मेरा इस्तीफा देने का दबाव बनाया गया। आखिरकार अटल जी ने मुझसे इस्तीफा ले लिया, लेकिन मैंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। कभी सार्वजनिक रूप से इस बारे में बात नहीं की थी। संघ पर से भी विश्वास हिल गया था। संघ ने भी सहायता नहीं की।

गुजरात दंगों के बाद अटल की राय पार्टी से अलग थी
आत्मकथा में शांता ने लिखा है कि गुजरात में दंगों के बाद अटल जी की राय पार्टी से अलग थी। उन्होंने राजधर्म की एक बार चर्चा की। फिर चुप हो गए। गोवा कार्यसमिति की बैठक से पहले मेरे सामने उन्होंने अरुण जेटली को क्या कहा था – मुझे आज भी याद है, पर बैठक में वह चुप हो गए थे। अयोध्या मंदिर आंदोलन में भी वे सक्रिय नहीं रहे। उनके पार्टी के साथ मतभेद थे।

 

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