शिमला – नितिश पठानियां
हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में सामने आया है कि प्रदेश में बेरोजगारी की समस्या लगातार बढ़ रही है।
उद्योग मंत्री ने सदन को बताया कि रोजगार कार्यालयों में कुल 5,93,457 आवेदक पंजीकृत हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं कि सभी पंजीकृत लोग पूरी तरह बेरोजगार हों, लेकिन यह आंकड़ा चिंताजनक है।
आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग के अनुसार प्रदेश में बेरोजगारी दर 2021-22 में 4.0 प्रतिशत थी, जो 2022-23 में बढ़कर 4.4 प्रतिशत हो गई और वर्ष 2023-24 में यह और बढ़कर 5.4 प्रतिशत तक पहुंच गई।
यह स्थिति प्रदेश की अर्थव्यवस्था और युवाओं के भविष्य के लिए एक चुनौती के रूप में देखी जा रही है।
सत्र की पहली बैठक में एक और जानकारी भी सामने आई। कसौली के विधायक विनोद सुल्तानपुरी के सवाल पर सरकार ने सदन को बताया कि प्रदेश में कुल 138 गांव ऐसे हैं जिनके नाम जाति के आधार पर रखे गए हैं।
सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल इन नामों को बदलने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है। केंद्र सरकार का गृह मंत्रालय पहले ही यह दिशा-निर्देश दे चुका है कि सामान्य परिस्थितियों में गांव, कस्बे, शहर या सड़कों के नाम बदलना उचित नहीं है।
गृह मंत्रालय ने 28 दिसंबर 1960 को जारी अपने आदेश में कहा था कि जिन नामों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हो, उन्हें बदलने से बचना चाहिए। केवल स्थानीय भावना या भाषाई कारणों से बदलाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उदाहरण के तौर पर किसी गांव का नाम केवल किसी राष्ट्रीय नेता के सम्मान में बदलना या भाषाई कारणों से नाम बदलना तर्कसंगत नहीं माना जाएगा।
नाम बदलने की प्रक्रिया भी काफी सख्त है। यदि किसी गांव का नाम बदलने का प्रस्ताव आता है तो राज्य सरकार को गृह मंत्रालय को पुराने नाम का कारण और नए नाम का औचित्य बताना होगा।
साथ ही यह भी देखना जरूरी है कि जिस नए नाम का प्रस्ताव रखा जा रहा है, वह पहले से राज्य या आसपास के क्षेत्रों में मौजूद न हो, ताकि भ्रम की स्थिति न बने। अंतिम स्वीकृति केंद्र सरकार ही प्रदान करती है।
वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में किसी भी गांव, कस्बे या शहर का नाम बदलने का कोई प्रस्ताव लंबित नहीं है। सरकार ने स्पष्ट किया कि नाम बदलने के मामले में फिलहाल कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है।