Big Breaking: हिमाचल में 6 MLA’s की विधानसभा सदस्यता बर्खास्त, स्पीकर ने सुनाया आदेश

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शिमला, 29 फरवरी – रजनीश ठाकुर

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हिमाचल के इतिहास में पहली मर्तबा सत्तारूढ़ राजनितिक दल ने अपने 6 सदस्यों को विधानसभा की सदयस्ता से अयोग्य किया है। लिहाजा, राज्य के 6 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

हिमाचल प्रदेश के छह बागी विधायकों पर बड़ा एक्शन हुआ है। विधानसभा से इन सभी छह विधायकों की विधायिकी बर्खास्त कर दी गई है। हिमाचल विधानसभा के स्पीकर कुलदीप सिंह पठानिया ने शिमला में प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी।

प्रेस कॉन्फ्रेस में कुलदीप सिंह पठानिया ने कहा कि तीन पेज का एक डिटेल ऑर्डर जारी किया गया है। मुझे एंटी डिफेक्शन लॉ के 10 शेड्यूल के तहत बतौर ट्रिब्युल के जज तौर पर यह फैसला मैंने सुनाया है। साथ में रजिस्ट्रार भी मौजूद हैं।

कुलदीप सिंह पठानिया ने कहा कि छह माननीय जो हमारे हैं, उन्होंने चुनाव कांग्रेस पार्टी से लड़ा था। एंटी डिफेक्शन लॉ की पटीशन दायर हुई है। इसी संदर्भ में याचिका संसदीय मंत्री की तरफ से आई है। सभी बागियों को सुनवाई का मौके दिए गए।

विरोधी वकील को कहा कि नौ बजे तक सुनवाई चल सकती थी लेकिन छह बजे तक सुनवाई हुई और रिकॉर्ड पेश किया गया। वकील सतपाल जैन ने समय मांगा था। फैसले के बारे में पठानिया ने कहा कि फैसला पब्लिक डोमेन में हैं।

पठानिया ने कहा कि व्हिप जारी किया गया था। विधायक सदन में मौजूद नहीं थे। बजट के दौरान भी नहीं मौजूद थे। सनुवाई के दौरान भी ये विधायक व्यक्तिगत तौर पर पेश नहीं हुए हैं। स्पीकर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और अन्य कोर्टों के पूर्व में हुए फैसलों का अध्ययन किया गया और फैसला दिया गया है।

राजेंद्र राणा 

राजेंद्र राणा 

बीजेपी में रहे राजेंद्र राणा पूर्व सीएम व केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रेम कुमार धूमल के शिष्य रहे। एक वक्त था जब धूमल का चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी राणा संभालते थे। लेकिन,गुरु व चेले में तलवारें खिंच गई। चुनाव जीतने के बाद महत्वाकांक्षा ये रही होगी कि कैबिनेट मंत्री बनाया जाये। अब सवाल ये उठता है कि सदस्यता रद्द होने के बाद क्या भाजपा उन्हें टिकट देगी। क्योंकि राणा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ऐसे जख्म दिए थे जिस कारण                                                     भाजपा ने सीएम की कुर्सी को खो दिया था।

सुधीर शर्मा

सुधीर शर्मा

सरकार बनने के बाद  6 बार के मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह की भी गुड बुक्स में रहने वाले सुधीर शर्मा का मंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा था। लेकिन जब उन्हें मंत्री पद नहीं मिला तो कई बार वह अपनी ही सरकार के खिलाफ भी बयानबाजी करते नजर आए। उप चुनाव में हार की आशंका को देखते हुए सुधीर ने चुनाव लड़ने से इंकार किया है।

आईडी लखनपाल 

आईडी लखनपाल 

2022 के चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाने वाले आईडी लखनपाल की पहचान कांग्रेस में इस कारण होती है, क्योंकि वो भाजपा के गढ़ से चुनाव जीतते रहे। ऐसे में उनके बगावती सुर अपनाना हर किसी को हैरान कर रहा है। निश्चित तौर पर तीसरी बार चुनाव जीतने के बावजूद भी अहम ओहदा न मिलने से आईडी लखनपाल भी निराश होंगे।

चैतन्य शर्मा

चैतन्य शर्मा

हिमाचल विधानसभा के सबसे युवा विधायक चैतन्य शर्मा उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव राकेश शर्मा के सुपुत्र है। उच्च शिक्षित चैतन्य शर्मा ने पहली बार ही चुनाव लड़ा था और जीतकर विधानसभा भी पहुंचे थे। चैतन्य शर्मा के बागी सुर अपनाने के पीछे का कारण अनदेखी और उनके निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों में धीमी गति को बताया जा रहा है। जानकार ये भी बताते है कि चैतन्य शर्मा हर हाल में चुनाव लड़ना चाहते थे ऐसे में अगर उन्हें भाजपा भी चुनाव में                                                टिकट देती तो वह भाजपा के टिकट पर भी चुनाव लड़ सकते थे। वहीं                                                        राजनीति में अनुभव की कमी और परिपक्वता न होना भी उनका पार्टी के                                                      खिलाफ बागी सुर अपनाने का कारण माना जा रहा है।

रवि ठाकुर

रवि ठाकुर

लाहौल स्पीति से दो बार विधायक रह चुके रवि ठाकुर ने भी बगावती सुर अपनाए है। इसका सबसे बड़ा बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि उन्हें जनजातीय मंत्री का पद नहीं दिया गया। इस बात पर किन्नौर के विधायक व वरिष्ठ नेता जगत सिंह नेगी की ताजपोशी की गई। लेकिन जब उनकी मांग को पूरा नहीं किया गया तो वह सरकार के खिलाफ भी बोलते नजर आए।

देवेन्द्र कुमार भुट्टो

देवेन्द्र कुमार भुट्टो

32 साल के बाद कुटलैहड़ विधानसभा क्षेत्र में को कांग्रेस की झोली में डालने वाले देवेन्द्र कुमार भुट्टो के बगावती सुर से हर कोई हैरान है। हालांकि उन्होंने 2017 में भाजपा को छोड़कर ही कांग्रेस का दामन थामा था। उनकी बगावत का सबसे बड़ा कारण उनकी भाजपा से नजदीकियां को माना जा रहा है। कांग्रेस में आने से पहले वह 25 साल तक भाजपा में रह चुके थे।

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