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चंबा का ‘मिनी मणिमहेश’ कुंजर महादेव, राधा अष्टमी पर कुंजर महादेव में उमड़ता है आस्था का सैलाब, 11:13 बजे उमड़ता है कुंड का जल

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चंबा के भट्टियात स्थित कुंजर महादेव को मिनी मणिमहेश के नाम से जाना जाता है। राधा अष्टमी पर यहां हजारों श्रद्धालु शाही स्नान के लिए पहुंचते हैं और कुंड के जल को लेकर स्थानीय आस्था की विशेष मान्यता है।

चम्बा – भूषण गुरुंग

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के भट्टियात उपमंडल में हाथीधार पर्वत पर स्थित कुंजर महादेव मंदिर आस्था, मान्यता और प्राकृतिक रहस्यों का अनूठा संगम है। चुवाड़ी मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर सिहुंता-द्रम्मण मार्ग पर पातका गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर पैदल चढ़ाई के बाद इस प्राचीन तीर्थ तक पहुंचा जा सकता है। हाथीधार की यही धार चंबा और कांगड़ा जिलों को अलग करती है।

कुंजर महादेव को क्षेत्र में ‘मिनी मणिमहेश’ के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि मणिमहेश की यात्रा न कर पाने वाले श्रद्धालु यहां स्नान कर भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। राधा अष्टमी के अवसर पर यहां पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और हिमाचल सहित विभिन्न क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं।

पांडवों से जुड़ी है मंदिर की मान्यता

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कुंजर महादेव का संबंध पांडव काल से माना जाता है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस क्षेत्र में कुछ समय बिताया और भगवान शिव की उपासना की थी। मंदिर परिसर में शिला रूपी पिंडी, शिव चरण पादुका और प्राकृतिक जलकुंड/कुएं को इसी प्राचीन परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।

हाथी धार का नामकरण

जब एक बार शिव और पार्वती हिमालय की और जा रहे थे, तो माता पार्वती को एहसास हुआ कि उस मां को भी कितना कष्ट हुआ होगा, जिसके पुत्र का सिर काट कर गणेश को लगाया गया है। माता पार्वती ने शिव से आग्रह किया कि उस सिर कटे हाथी का उद्धार करें।

उस समय शिव ने उस हाथी को इसी जगह लाकर स्थापित किया और उसको मोक्ष प्रदान किया। इस जगह पर ‘हाथी का उद्धार’ हुआ इसलिए इसे ‘हाथी धार’ के नाम से जाना गया। आज भी उस पहाड़ की शक्ल हूबहू किसी हाथी की तरह नजर आती है।

पौराणिक प्रसंग

पौराणिक कथा के अनुसार, जब भगवान गणेश के लिए शिव गणों ने हाथी का सिर काटा था, तब हाथियों ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की थी। बाद में नारद जी ने आकर उन्हें बताया कि वह सिर गणेश जी को अर्पित किया गया है। यह सुनकर हाथी प्रसन्न हुए और उन्होंने शिव शंभू की स्तुति की, जिसके बाद इस स्थान का नाम कुंजर महादेव पड़ा।

कुंजर महादेव नाम का रहस्य

कुंजर महादेव का नाम शिव को हाथियों ने दिया है। कुंजर का अर्थ होता है हाथी। कहते हैं जब हाथी का सिर काट कर गण ले गए, तो हाथियों ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। तब देव ऋषि नारद ने हाथियों को बताया कि आपका सिर स्वयं देवों के देव भगवान शिव के पुत्र गणेश को लगाया गया है।

यह जान कर हाथी खुश हो गए और इसी जगह पर आ कर उन्होंने भगवान शिव की जय जयकार की और भगवान शिव को हाथियों के देव यानी कुंजर महादेव के नाम से संबोधित किया इसलिए इस स्थान को कुंजर महादेव कहा जाने लगा और इस स्थान का नाम कुंजरोटी हो गया।

शिव के चरण हैं यहां

कहते हैं कि एक बार राक्षसों और देवताओं का युद्ध हो रहा था और एक मायावी राक्षस जितनी बार मारा जाता उतनी बार जीवित हो जाता था। भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया। भगवान शिव ने कहा कि यह स्थान कलियुग में बहुत प्रसिद्ध होगा। जो भी यहां आकर स्नान करेगा, उसके सब पाप कट जाएंगे।

 

इस जगह पर मैंने त्रिशूल से डल का निर्माण किया है इसलिए यहां मेरे चरण रहेंगे और मेरा वास कैलाश पर्वत पर होगा, जिसे मणिमहेश कहा जाएगा। तब से यह स्थान भी भगवान शिव के चरणों के कारण पवित्र हुआ और लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र बना।

गडरिए को हुए कलियुग में प्रथम दर्शन

एक अन्य कथा के अनुसार इस रास्ते एक गडरिया  भेड़, बकरियां लेकर जाता था। इस जगह पर वो अपनी दराती को तेज करने के लिए पत्थर ढूंढने लगा। तब उसने एक पत्थर पर दराती की धार बनाई और वो धार 6 महीने तक बनी रही। गड़रिए ने सोचा अगली बार वापस जाते हुए मैं उस पत्थर को साथ ही ले जाऊंगा।

जब वो वापस आया, तो उसने उसी पत्थर को फिर से ढूंढा और उस पर प्रहार किया जिससे उसमें एक दरार आ गई, वो पत्थर आज भी वैसे ही स्थापित है। तभी आकाशवाणी हुई, हे मूर्ख तूने यह क्या किया। इसका पुण्य और पाप तुझे दोनों भुगतने होंगे। तब वो गडरिया क्षमा मांगने लगा और शिव को देख कर प्रसन्न भी हुआ। उसने कहा कि मुझे पाप से मुक्त कर मोक्ष प्रदान कीजिए।

तब भगवान ने उसे रहस्य बताया कि इस कुंड में स्नान करके तुम इस पाप से मुक्त हो सकते हो और मोक्ष की प्राप्त करोगे, पर तुम्हें और तुम्हारी भेड़ बकरियों को यहीं पर पत्थर बनना होगा। कलियुग में कोई भी प्राणी इस कुंड में स्नान कर के पाप से मुक्ति पा सकता है। आज भी कुछ पत्थर उन भेड़, बकरियों के आकार के वहां देखे जा सकते हैं।

सब पापों की मुक्ति

कलियुग में मात्र ये ऐसा धाम माना जाता है जो किसी भी प्रकार के पाप से मुक्ति का मार्ग दिखाता है। इसीलिए हर साल लाखों भक्त यहां आकर कुंड में डुबकी लगाते हैं। इस बार 28 अगस्त को प्रसिद्ध मणिमहेश मेले के साथ ही यहां भी लाखों भक्त नतमस्तक होंगे और भगवान शिव के जयकारे लगेंगे।

राधा अष्टमी पर जल का ‘चमत्कार’ देखने पहुंचते हैं श्रद्धालु

कुञ्जर महादेव की सबसे चर्चित मान्यता यहां स्थित प्राकृतिक कुएं से जुड़ी है। स्थानीय लोगों के अनुसार पूरे वर्ष इस कुएं में पानी सीमित मात्रा में रहता है, लेकिन राधा अष्टमी के दिन सुबह करीब 11:13 बजे के आसपास जल अचानक उमड़कर बाहर आने लगता है। इसी जल से श्रद्धालुओं के शाही स्नान की परंपरा जुड़ी हुई है।

स्थानीय आस्था के अनुसार मणिमहेश में होने वाले शाही स्नान के दिन ही कुञ्जर महादेव में भी शाही स्नान किया जाता है। इस अवसर पर दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और पवित्र स्नान कर भगवान शिव के दर्शन करते हैं।

जीर्णोद्धार से बदल रहा मंदिर का स्वरूप

कुञ्जर महादेव मंदिर कमेटी की ओर से मंदिर और आसपास के क्षेत्र के जीर्णोद्धार का कार्य किया जा रहा है। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए सुविधाओं के विकास पर भी जोर दिया जा रहा है।

प्राकृतिक सुंदरता, पौराणिक मान्यताओं और शिव आस्था से जुड़ा कुञ्जर महादेव आज भट्टियात की धार्मिक पहचान बन चुका है। यही वजह है कि राधा अष्टमी के दौरान यहां होने वाला शाही स्नान श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है।

कैसे 

 

यहां पहुंचने का मार्ग बहुत सरल है। चुवाड़ी मुख्यालय से लगभग 20 किमी. दूर सिहुंता, द्रमन मार्ग पर पातका गांव से लगभग डेढ़  किमी. की दूरी पर यह स्थान है। पठानकोट से 70 किमी. दूर और गगल एयरपोर्ट से लगभग 50 किमी. की दूरी पर यह जगह चंबा और कांगड़ा को बांटने वाली हाथी धार पर है। इस धार के एक तरफ  जिला चंबा और एक तरफ  जिला कांगड़ा है।

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