
धर्मशाला,राजीव जसवाल:-
17वीं निर्वासित तिब्बत सरकार (केंद्रीय तिब्बती प्रशासन) के नए प्रधानमंत्री और 45 सदस्यीय संसद के लिए रविवार को होने वाले द्वितीय चरण की मतदान प्रक्रिया पर चीन, अमेरिका और भारत सहित पूरी दुनिया की नजर है। निर्वासित तिब्बत सरकार के चुनाव अमेरिका और भारत के लिए कूटनीतिक रूप से बेहद अहम हैं। पिछले कुछ समय से चीन के साथ भारत और अमेरिका के रिश्ते बेहतर नहीं चल रहे हैं।
चीन पर कूटनीतिक दबाव बनाने के लिए अमेरिका लगातार अंतरराष्ट्रीय पटल पर तिब्बत और धर्मगुरु दलाईलामा के उत्तराधिकारी
का मुद्दा उठा रहा है। भारत भी कूटनीतिक रूप से तिब्बत मुद्दे पर मौन सहमति दे रहा है। इसलिए, रविवार को दुनिया भर में 17वीं निर्वासित तिब्बत सरकार के लिए होने वाली चुनाव प्रक्रिया अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की धुरी बनी हुई है।
काइराजनीतिक दल नहीं होता है चुनाव में दिलचस्प है कि इस चुनाव में किसी
भी राजनीतिक दल का कोई लेना देना नहीं होता है। सिर्फ व्यक्ति ही चुनाव लड़ते हैं। चुनाव में न तो 1. कोई रैली होती है और न ही तामझाम वाला प्रचार। संविधान के मुताबिक प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार लगातार दो बार ही चुनाव लड़ पाता है। वर्ष 2011 से पहले दलाईलामा ही उम्मीदवारों का चुनाव तिब्बत सरकार का मुख्यालय धर्मगुरु दलाईलामा के निवास स्थान मैक्लोडगंज में है। यहीं से सरकार अपना पूरा कामकाज चलाती है।
करते थे। लेकिन, 2011 में दलाईलामा अपनी सभी राजनीतिक शक्तियां चुने हुए नेता यानी प्रधानमंत्री को दे दी थी। निर्वासित
*अमेरिका लगातार उठा रहा है तिब्बत मुद्दा*
निर्वासित तिब्बत सरकार की चुनाव प्रक्रिया के बीच अमेरिका की संसद ने फरवरी में तिब्बत पॉलिसी एंड सपोर्ट एक्ट (टीपीएसए) 2020 को पारित किया था। इस बिल में साफ लिखा है कि दलाईलामा का अगला उत्तराधिकारी चुनने में चीन कोई दखल नहीं कर सकता है। दलाईलामा के किसी भी मामले में चीन का हस्तक्षेप स्वतंत्रता में दखल माना जाएगा अमेरिका ने कुछ माह पहले पहली बार निर्वासित तिब्बत सरकार के प्रधानमंत्री लोबसंग सांग्ये को व्हाइट हाउस में एंट्री दी थी
जिससे चीन काफी चिढ़ गया था।
*दुनिया भर में 80 हजार मतदाता करेंगे वोट*
निर्वासित तिब्बत सरकार के मुख्य चुनाव आयुक्त वांगडु ने कहा कि द्वितीय एवं अंतिम चरण की चुनावी प्रक्रिया में दुनिया भर में करीब 80 हजार पंजीकृत मतदाता मतदान करेंगे। दूसरे चरण के मतदान का परिणाम 14 मई को घोषित किया जाएगा। इसी दिन तय हो जाएगा कि निर्वासित तिब्बत सरकार के अगले प्रधानमंत्री पेंपा सेरिंग होंगे या केलसंग दोरजे आकत्संग।
*चीन में नहीं, हमारे पास है लोकतंत्र : तेंजिन*
फरवरी में चीन के खिलाफ मैक्लोडगंज से दिल्ली तक पद यात्रा निकालने वाले एक्टिविस्ट तेंजिन सुब कहते हैं कि निर्वासन में रहकर भी तिब्बत लोकतांत्रिक रूप से मजबूत है। चुनावी प्रक्रिया इसका प्रमाण है। चीन हमें तोड़ने की उम्मीद न रखे। हमारे पास लोकतंत्र है जो चीन में नहीं है।
