
सरहद
लेख़क- इक सैनिक बालक राम शर्मा
देश का सैनिक खड़ा सरहद पर, देश की ढाल बनकर खड़ा रहता है सरहद पर।
सिनियर का हुक्म लेकर खड़ा है सरहद पर, अपने कमांडर ऑफिसर की ढाल बनकर खड़ा रहता है सरहद पर।
नाका, अंबूस, पिंजरा, गश्त पर देश की रक्षा करता है सरहद पर, परिवार से बिछुड़ कर दिन रात खड़ा है सरहद पर।
पक्का कच्चा खाना खाकर खड़ा है सरहद पर, आगे गोली पिछे देश और परिवार फिर भी खड़ा है सरहद पर।
कब मौत आ जाए नहीं पता, फिर भी खड़ा है सरहद पर, न चैन की नींद, न चैन से आराम, भुखा प्यासा खड़ा है सरहद पे।
न विस्तर, न पंखा, सुखी धरती पर खड़ा है सरहद पर।
हमारे वेतन भत्ते पैन्शन देदो सैनिक को, न रखो जंतर-मंतर पर, इस आस में पल पल जीता, पल पल मरता, यादों में फिर भी खड़ा है सरहद पर।
ऑफिसर को भगवान की तरह माने, हुक्म की पालन करता खड़ा है सरहद पर।
मौत ने देखे, परिवार पलेगा जिंदगी भर, इस आस से खड़ा है सरहद पर, वेतन, भत्ते, पैन्शन, देख मौत को गले लगाकर खड़ा है सरहद पर।
आज जब वन रैंक, वन पेंशन के टेबल देखे, यादें थी सरहद पर, घटती देखी पैन्शन, आंख के आंसू न दिखे, अंदर हो गई टैन्शन, फिर भी तिरंगा ओढ़कर खड़ा है सरहद पर।
नहीं सोचा था कि हमारा रक्षक ऑफिसर हमें ही धोख़ा देगा, पर आज भी खड़ा है सैनिक सरहद पर।
रक्षक ऑफिसर ने धोख़ा दिया, कोई नहीं आया जंतर-मंतर पर, धोख़ा देख सिपाही से ऑनरेरी लेफ्टिनेंट कैप्टन अपने हक के लिए पहुंचा जंतर-मंतर पर।
जिना मरना सिखा है ड्युटी पर, अपने हक़ के लिए पहुंच गया दिल्ली जंतर-मंतर पर, केन्द्र सरकार से जगाकर हक़ लेंगे लड़-लड़ कर।
सब्र का बांध न टूटे, इस इम्तिहान को न लो जीना मरना होगा जंतर-मंतर पर, जागो जागो माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी, सरहद का रक्षक खड़ा है जंतर-मंतर पर।
जयहिंद
